प्राचीन काल के व्यापारी
एक व्यापारी चीजों को खरीदने और बेचने का काम करता है। प्राचीन काल से ही मनुष्य व्यापार करता आ रहा है। चीजों को बेचने और खरीदने के लिए व्यापारी लंबी यात्राएं किया करते थे तथा साथ में वे संस्कृति और विचारों के आदान-प्रदान में भी सहायक होते थे।
रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध
दक्षिण भारत का सोना और यहाँ के मसाले दूर-दूर तक विख्यात थे। काली मिर्च इतनी कीमती होती थी कि इसे 'काला सोना' भी कहा जाता था। रोम के व्यापारी जहाजों और काफिलों में आते थे और यहाँ से काली मिर्च ले जाते थे। दक्षिण भारत से रोम के अनेक सिक्के मिले हैं, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि भारत और रोम के बीच अच्छा-खासा व्यापार होता था।
प्राचीन समुद्री मार्ग
व्यापारियों ने भारत से होकर कई समुद्री मार्गों की खोज की। इनमे से कुछ मार्ग तट के साथ-साथ चलते थे तथा कुछ मार्ग अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होकर जाते थे। इन सागरों को पार करते वक़्त व्यापारी दक्षिण-पश्चिमी मानसून की मदद लेते थे।
तटीय क्षेत्रों के नए राज्य
भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग में तटरेखा के आस-पास व्यापार काफी फला-फूला। जो राजा या मुखिया इस तटरेखा पर नियंत्रण पा लेता था वह बहुत शक्तिशाली और धनी हो जाता था। आज से करीब 2300 वर्ष पहले दक्षिण भारत में तीन राजपरिवारों का बोलबाला था। इनके नाम थे चोल, चेर और पांड्य। संगम साहित्य में कई बार 'मुवेन्दार' का जिक्र आया है। मुवेन्दार का मतलब होता है तीन मुखिया। इस शब्द का प्रयोग इन्हीं तीन राजवंशों के लिए किया जाता है।
संगम साहित्य
तमिल भाषा में आज से 2300 वर्ष पहले रची गयी रचनाओं को संगम साहित्य का नाम दिया गया है। इनका संकलन मदुरै में होने वाले कवि सम्मेलनों में किया जाता था, इसलिए इन्हें संगम का नाम दिया गया है। संगम और सम्मेलन एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। संगम साहित्य से उस जमाने के दक्षिण भारतीय गाँवों की सामाजिक रचना का पता चलता है।
दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र
इनमें से हर मुखिया की सत्ता के दो केन्द्र थे। इनमें से एक तटीय हिस्से में तथा दूसरा अंदरूनी हिस्से में होता था। दक्षिण भारत मे 6 शक्तिशाली नगर थे। इनमें से सबसे अहम थे पुहार (कावेरीपट्टनम) और मदुरै। कावेरीपट्टनम का बंदरगाह चोल के अधीन था, जबकि मदुरै में पांड्य की राजधानी थी।
टैक्स
ये शक्तिशाली राजा व्यापारियों को सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन बदले में वे कर नहीं वसूलते थे, बल्कि वे व्यापारियों से उपहार मांगते थे। वे अक्सर सैनिक अभियान पर निकल जाते थे और आस-पास के इलाकों से उपहार वसूलते थे। वसूले गए धन का कुछ हिस्सा राजा अपने पास रख लेता था जबकि इसका इसका अधिकांश हिस्सा अन्य लोगों को बाँट दिया जाता था जैसे कि रिश्तेदार सैनिकों और कवियों में। संगम साहित्य के कई कवियों ने इन राजाओं की प्रशस्ति में कवितायें लिखी हैं। उपहार के तौर पर कवियों को कीमती पत्थर, सोना, घोड़े, हाथी, रथ, उत्कृष्ट कपड़े आदि मिलते थे।
सातवाहन
सातवाहन एक शक्तिशाली राजवंश था। यह राजवंश पश्चिम भारत में उभरा था। सातवाहन राजवंश के सबसे शक्तिशाली राजा का नाम गौतमीपुत्र श्री सातकर्णी था। उसकी माता गौतमी बलश्री ने उसके बारे में अभिलेख लिखा था। इसी अभिलेख में हमें सबसे सातकर्णी के बारे में पता चलता है। सातवाहन शासकों को 'दक्षिणापथ का स्वामी' कहा जाता था। 'दक्षिणापथ' का अर्थ है दक्षिण की ओर जाने वाला रास्ता। सातकर्णी ने अपनी सेनाओं को पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी इलाकों में भी भेजा।
रेशम मार्ग (सिल्क रुट)
रेशम की खोज सबसे पहले चीन में आज से 7000 वर्ष पहले हुई, लेकिन रेशम बनाने की जानकारी को चीन के लोगों ने गुप्त रखा। लेकिन रेशम के कपड़ों को अमीर व्यापारियों और राजाओं के लिए उपहार के रूप में दूर-दूर भेजा जाता था। व्यापारी भी दूर देशों में रेशम बेचने जाया करते थे, क्योंकि रेशम की ऊंची कीमत मिल जाती थी। रेशम के व्यापारियों को पहाड़ो और दर्रो से होकर बहुत ही दुर्गम मार्ग को पार करना होता था। इसमें हमेशा लुटेरों द्वारा लूटे जाने का ख़तरा रहता था। रेशम के व्यापार के प्राचीन मार्ग को रेशम मार्ग या सिल्क रूट कहते थे। जमीन से जाने वाला मार्ग हिमालय और हिंदुकुश पर्वतमालाओं से होकर गुजरता था। समुद्री मार्ग अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होकर गुजरता था। कुछ राजा रेशम मार्ग पर नियंत्रण करने की कोशिश करते थे, ताकि व्यापारियों की सुरक्षा हो सके। जिससे व्यापार को फलने-फूलने में मदद मिलती। इससे अच्छे व्यापार होता और राजाओं को व्यापारियों से बेहतर कर और उपहार मिलने की उम्मीद बढ़ जाती।
कुषाण
केन्द्रीय एशिया और उत्तर-पश्चिमी भारत पर कुषाण राजवंश का शासन 2000 वर्ष पहले था। अन्य राजाओं की तुलना में कुषाण राजाओं का रेशम मार्ग पर सबसे अच्छा नियंत्रण था। पेशावर और मथुरा उनकी सत्ता के दो केंद्र थे। तक्षशिला भी इन्ही के आधीन था। कुषाण शासन काल में रेशम मार्ग की एक शाखा केन्द्रीय एशिया से लेकर सिन्धु नदी के मुहाने तक जाता था। इन बंदरगाहों से रेशम को पश्चिम में रोम तक ले जाया जाता था। सोने के सिक्के जारी करने वालों में कुषाणों का नाम अग्रणी राजाओं में आता है। रेशम मार्ग के व्यापारी इन्ही सोने के सिक्कों को ले जाते थे।
बौद्ध धर्म का प्रसार
इस काल में व्यापार के साथ बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ। कुषाण राजाओं में सबसे प्रसिद्ध कनिष्क था। उसने दुनिया के विभिन्न भागों में बौद्ध धर्म के प्रसार में काफी योगदान दिया। कनिष्क के दरबार में एक विख्यात कवि था जिसका नाम अश्वघोष था। अश्वघोष ने बुद्ध-चरित की रचना की, जो बुद्ध की जीवनी है। उस जमाने में अश्वघोष के साथ-साथ कई लेखकों ने संस्कृत में लिखना शुरू किया।
महायान
इस समय बौद्ध धर्म की एक नई धारा महायान का विकास हुआ। पहले बुद्ध को कुछ चिन्हों या प्रतीकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता था, लेकिन महायान में बुद्ध की मूर्तियाँ भी बनने लगी थीं। इनमें से अधिकांश मूर्तियाँ मथुरा में बनी हैं और कुछ तक्षशिला में। जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर लेता था उसे बोधिसत्व कहा जाता था। पहले एक बोधिसत्व को संसार से अलग रहकर अपना पूरा समय ध्यान में बिताना होता था। अब बोधिसत्व लोगों के बीच रहकर उपदेश दे सकता था। बोधिसत्व की पूजा लोकप्रिय हो गयी। यह परिपाटी केंद्रीय एशिया, चीन और बाद में कोरिया और जापान में भी फैल गई।
तीर्थयात्री
जो व्यक्ति धार्मिक प्रयोजन से यात्रा करता है उसे तीर्थयात्री कहते हैं। व्यापारियों के साथ कई तीर्थयात्रियों ने भी दूर-दूर की यात्राएं की।
चीनी तीर्थयात्री
इस समय के चीनी तीर्थयात्रियों में तीन काफी मशहूर हुए। जिनके नाम हैं- फा-शिएन, श्वैन त्सांग और इत्सिंग। ये सभी बौद्ध तीर्थयात्री थे। फा-शिएन करीब 1600 वर्ष पहले भारत आया था, श्वैन त्सांग 1400 वर्ष पहले और इत्सिंग उसके 50 वर्ष बाद आया था। वे बुद्ध और उनसे जुड़े स्थानों को देखने और समझने के मकसद से आए थे।
भक्ति परंपरा
भक्ति परंपरा की शुरूआत तब हुई जब से हिन्दू देवी देवताओं को एक नए दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। आज हम इन देवी देवताओं को जिन रूपों में देखते हैं उनका विकास इसी भक्ति परंपरा के कारण हुआ। एक समय आ गया था जब धर्म पर पुरोहितों का शिकंजा कस गया था। समाज में बिना मतलब के आडंबरों और कुरीतियों का बोलबाला था। धर्म को इन बीमारियों से मुक्ति दिलाने के प्रयास में भक्ति परंपरा की शुरूआत हुई। अब लोगों को पूजा के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं था। लोग अपने घरों में ही छोटे-छोटे मंदिर बनाकर पूजा करने लगे थे।
Sudhanshu Mishra
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