दिल्ली का लौह स्तम्भ
दिल्ली का लौह स्तम्भ साधारण स्तम्भ नहीं है। यह स्तम्भ पिछले 1500 वर्षों से यहाँ खड़ा है और इसमें आज तक जंग नहीं लगा है। इससे पता चलता है कि उस जमाने में धातु शोधन की तकनीक कितनी विकसित थी। इस स्तम्भ पर एक अभिलेख है जिससे पता चलता है कि इसे गुप्त साम्राज्य में चंद्रगुप्त के काल मे बनवाया गया था।
स्तूप
'स्तूप' शब्द का मतलब होता है टीला। स्तूपों का निर्माण अक्सर बुद्ध के अनुयायियों द्वारा करवाया गया था। स्तूप के बीच में अक्सर एक बक्सा रखा जाता है। इस बक्से में बुद्ध या उनके शिष्यों के शरीर के अवशेष रखे जाते थे। उस बक्से को मिट्टी से ढक दिया जाता था। उसके बाद इसे कच्ची ईंटो से और फिर पकी ईंटो से ढका जाता था। आखिर में कभी-कभी इसे पत्थर से ढका जाता था, जिस पर नक्काशी की जाती थी। स्तूप के चारो ओर एक प्रदक्षिणा मार्ग बनाया जाता था। बुद्ध के भक्त इस मार्ग पर घड़ी की सुई की दिशा में प्रदक्षिणा करते हैं। प्रदक्षिणा मार्ग को चारो ओर रेलिंग से घेर दिया जाता था, जिसे वेदिका कहते हैं। वेदिका में एक प्रवेश द्वार बना दिया जाता था। रेलिंग और प्रवेश द्वार पर सुंदर नक्काशी की जाती थी। स्तूप की बेहतरीन संरचना और उस पर की गई सुंदर नक्काशी से उस जमाने के वास्तुशिल्प का अंदाजा मिलता है।
हिन्दू मंदिर की संरचना
हिन्दू मंदिर के सबसे महत्वपूर्ण भाग को गर्भ गृह कहते हैं। यहीं पर मुख्य देवी-देवता की मूर्ति रखी जाती है। इसी स्थान पर पुरोहित अनुष्ठान करते हैं और लोग पूजा करते हैं। गर्भ गृह के ऊपर अक्सर एक ऊँचा स्तम्भ बना दिया जाता था। इस स्तम्भ को शिखर कहते हैं। शिखर से गर्भ गृह का पता चलता है। अधिकतर मंदिरों में एक बड़ा सा हॉल होता था जिसे मंडपम कहते हैं। मंडपम में ढेर सारे लोग इकट्ठा हो सकते हैं। शुरू में मंदिरों को पत्थर और ईंटो से बनाया जाता था, लेकिन बाद में कई ऐसे मंदिर बने जिन्हें केवल पत्थरों से बनाया गया। कुछ मंदिरों को तो केवल एक ही विशाल पत्थर को तराशकर बनाया गया, जैसे कि महाबलीपुरम का मंदिर।
चित्रकला
महाराष्ट्र में स्थित अजंता की गुफाओं की चित्रकला बहुत प्रसिद्ध हैं। आज भी इन चित्रों के रंग चमकदार और चटक लगते हैं।
किताबें
यह वह समय था जब भारत के कुछ बेहतरीन महाकाव्यों की रचना थी। जो साहित्यिक किताब हजारों पन्नो में रहती है उसे महाकाव्य कहते हैं। लगभग 1800 वर्ष पहले इलांगो नामक कवि ने मशहूर तमिल महाकाव्य 'सिलप्पदिकारम' की रचना की थी। सत्तनार ने तमिल महाकाव्य 'मणिमेखलई' की रचना लगभग 1400 वर्ष पहले की थी। कालिदास ने कई महाकाव्यों और नाटकों की रचना की। इसी काल में पुराणों की रचना हुई थी। महिलाओं और शूद्रों को भी पुराण पढ़ने की अनुमति थी। पुराणों को सरल संस्कृत में लिखा गया था। इसी समय रामायण और महाभारत की रचना हुई थी। महाभारत को वेदव्यास और रामायण को वाल्मीकि ने लिखा था। आम लोगों की कई कहानियों को संकलित करके पुस्तक का रूप दिया गया। जातक कथाएँ और पंचतंत्र ऐसी ही किताबें हैं।
विज्ञान
आर्यभट्ट एक गणितज्ञ और ज्योतिषशास्त्री थे। उनकी पुस्तक आर्यभटियम में गणित और ज्योतिष के कई सिद्धांत हैं। उन्होंने गणित और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है जिसके कारण दिन और रात होते हैं। ग्रहणों का सही कारण भी आर्यभट्ट ने बताया था। आर्यभट्ट ने वृत्त की परिधि ज्ञात करने का सही तरीका भी निकाला था। यह विधि आज भी इस्तेमाल होती है।
Sudhanshu Mishra
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