सिन्धु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता आज से 4700 वर्ष पहले फली-फूली थी। उस जमाने के नगर मुख्य रूप से सिन्धु नदी के मैदानों में फले-फूले थे। इसलिए इस सभ्यता को सिन्धु घाटी सभ्यता कहा जाता है। इस सभ्यता का सबसे पहला खोजा जाने वाला शहर हड़प्पा है अतः इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है।
हड़प्पा
हड़प्पा आज के पकिस्तान में पड़ता है। इस पुरास्थल की खोज संयोग से हुई थी। 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग यहाँ पर रेलवे लाइन बिछाने का काम कर रहे थे तो उन्हें खंडहर मिले थे। मजदूरों और कारीगरों को लगा कि वह किसी साधारण से शहर का खंडहर होगा। इसलिए वहाँ से ईंटे निकालकर रेल निर्माण में इस्तेमाल की जाने लगीं। आज से लगभग 80 वर्ष पहले एक ब्रिटिश पुरातत्वविद को अहसास हुआ कि यह कोई मामूली शहर नहीं बल्कि बहुत ही प्राचीन शहर था।
सिन्धु घाटी सभ्यता के अन्य महत्वपूर्ण पुरास्थल
●मोहनजोदड़ो
●कालीबंगा
●लोथल
●धोलावीरा
सिन्धु घाटी सभ्यता के शहरों की विशेषताएं
1- योजनाबद्ध शहर
ऐसा लगता है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के शहरों का निर्माण बहुत ही सटीक योजना के आधार पर हुआ था। हड़प्पा का नगर दो भागों में बँटा हुआ था-
●पश्चिमी भाग
●पूर्वी भाग
नगर का पश्चिमी भाग छोटा था लेकिन ऊँचाई पर था। ऊँचे भाग को नगर दुर्ग कहते थे। इस दुर्ग में कुछ खास इमारतें बनी थी। नगर का पूर्वी भाग नीचे था लेकिन बड़ा था, इस भाग को निचला शहर कहते थे। नगर दुर्ग में एक बड़ा तालाब मिला है, पुरातत्वविदों ने इसे महान स्नानगार का नाम दिया है। इसका निर्माण पकी ईंटो से हुआ था। महान स्नानागार की दीवारों और फर्श पर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी ताकि रिसाव न हो सके। इसमें उतरने के लिए दो तरफ से सीढ़ियां बनी थीं और चारो तरफ कमरे बने थे। इतिहासकारों का अनुमान है कि यहाँ पर विशेष अवसरों पर विशिष्ट नागरिक स्नान किया करते थे। धनी लोग शहर के ऊपरी हिस्से में रहते थे, जबकि मजदूर लोग शहर के निचले हिस्से में रहते थे।
2- पकी ईंटो का प्रयोग
घर और अन्य इमारते पकी ईंटो से बनी थीं। ईंट एक ही आकार के थे। इससे यह पता चलता है कि हड़प्पा के कारीगर कुशल होते थे। ईंटो को 'इंटरलॉक' पैटर्न में जोड़ा जाता था। इससे इमारत को अधिक मजबूती मिलती थी।
3- सड़कें और नालियाँ
सड़क पर ईंट बिछाई जाती थी। सड़कें आपस मे समकोण पर काटती थीं। नालियों का जाल भी योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया था। हर घर से निकलने वाली नाली सड़क की नाली में मिलती थी। नालियों को पत्थर की सिल्लियों से ढका जाता था। थोड़े-थोड़े अंतराल पर इनमें मेनहोल जैसे बने होते थे ताकि साफ-सफाई हो सके।
4- योजनाबद्ध मकान
घरों की दीवारें मोटी और मजबूत होती थीं, कुछ मकान तो दो मंजिले भी होते थे। इससे उस जमाने की परिष्कृत वास्तुकला का पता चलता है। एक घर में एक रसोई, एक स्नानागार और एक बड़ा सा आंगन होता था।
5- भण्डार गृह
सिन्धु घाटी सभ्यता के नगरों में बड़े भण्डार गृह भी पाए गए हैं। ऐसे भण्डार गृह से झुलसे हुए अनाज भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि उस जमाने में अनाज का उत्पादन आवश्यकता से अधिक होता था। इतिहासकारों का यह भी अनुमान है कि टैक्स को अनाज के रूप में वसूला जाता था और बड़े भण्डार गृह में टैक्स द्वारा वसूले गए अनाज की रखा जाता था।
लोगों का जीवन
गाँव के लोगों का मुख्य पेशा खेतीबाड़ी होता था लेकिन शहर के लोग कई अन्य पेशों में शामिल रहते थे।
हड़प्पा शहर के लोगों के कुछ संभावित पेशे
1- शिल्प
बर्तन बनाने के लिए मिट्टी, तांबा और कांसे का उपयोग होता था। औज़ार और सील बनाने के लिए तांबे और कांसे का प्रयोग होता था। मिट्टी के सील भी बनाये जाते थे। कई बड़े बर्तन भी मिले हैं जिनका इस्तेमाल शायद अनाज रखने के लिए किया जाता था। जेवर बनाने के लिए सोना, मनके, लकड़ी और मिट्टी का प्रयोग होता था। मनके बनाने के लिए महंगे पत्थर का प्रयोग होता था। जैसे कि कैनेलियन, जैस्पर, क्रिस्टल आदि। खिलौने बनाने के लिये मिट्टी और लकड़ी का प्रयोग होता था। एक गाड़ी के आकार का खिलौना बड़ी अच्छी हालत में मिला है। इसे देखकर लगता है कि उस जमाने में गाड़ी को जानवरों द्वारा खींचा जाता था। खिलौने बर्तनों और जेवरों पर जटिल नक्काशी देखने को मिलती है। इससे भी सिन्धु घाटी सभ्यता के कारीगरों की दक्षता का पता चलता है। कुछ तकलियाँ भी मिली हैं, जिनका प्रयोग धागा बनाने में किया जाता था। लोग कपास से धागा बनाते थे।
2- व्यापार
हड़प्पा के लोगों का मुख्य व्यवसाय व्यापार था। ताँबा राजस्थान तथा ओमान से आता था। हड़प्पा के कुछ सील मेसोपोटामिया में मिले हैं। इससे पता चलता है कि हड़प्पा और मेसोपोटामिया के बीच व्यापार हुआ करता था। गुजरात के लोथल में एक बंदरगाह मिला है। इससे पता चलता है कि उस जमाने मे समुद्री मार्ग से व्यापार होता था। कई तरह के सील (एक प्रकार की मुद्रा) मिलने से यह पता चलता है कि व्यावसायिक लेन-देन का सिस्टम अच्छी तरह से विकसित था।
3- खेती
झुलसे हुए अनाजों के अवशेष भी मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता के गाँवों में गेहूँ, जौ, दलहन, मटर, चावल, तिल, अलसी और सरसों की खेती होती थी। हल की शक्ल का एक खिलौना भी मिला है। इससे पता चलता है कि खेत जोतने के लिए हल का इस्तेमाल होता था। बड़े-बड़े भण्डार गृह और बर्तनों के मिलने से यह पता चलता है कि अनाजों का उत्पादन प्रचुर था। पुरास्थलों से कई पालतू पशुओं की हड्डियाँ भी मिली हैं। इससे पता चलता है कि हड़प्पा के लोग गाय, भैंस, बकरियाँ, भेड़ और सूअर पाला करते थे।
प्रशासन तंत्र
इतिहासकारों का अनुमान है कि सिन्धु घाटी सभ्यता में किसी न किसी प्रकार का प्रशासन तंत्र भी रहा होगा। हो सकता है कि प्रशासन संभालने के लिए लोगों की समिति रही हो।
मनोरंजन
पुरास्थलों से खिलौने और मूर्तियाँ मिली हैं । इससे पता चलता है कि लोगों में मनोरंजन का भी प्रचलन था।
लिपि
हड़प्पा से मिले हुए सीलों पर किसी लिपि में कुछ लिखा हुआ भी है। इसका मतलब है कि उस जमाने में लोग लिखना जानते थे। सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को अब तक कोई पढ़ नहीं पाया है।
हड़प्पा सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन
लोग देवी देवताओं की पूजा करते थे, वहाँ से मिली कई मूर्तियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं। पुरातत्वविदों का ध्यान खासकर एक पुरुष की मूर्ति, (जिसके चारो ओर पशु हैं) ने खींचा है। यह मूर्ति कुछ-कुछ हिन्दू धर्म के शंकर भगवान से मिलती जुलती है। शंकर भगवान को पशुपतिनाथ के नाम से भी जानते हैं।
हड़प्पा सभ्यता का अंत
हड़प्पा सभ्यता का अंत अचानक से आज से 3900 वर्ष पहले हो गया। टूटी सड़कों और जाम पड़ी नालियों से पता चलता है कि पूरा तंत्र खराब हो चुका था। बाद के समय की खुदाई में दूर के स्थानों के सामानों के अवशेष नहीं मिलते हैं। इसका मतलब है कि बाहरी दुनिया से व्यापार समाप्त हो चुका था। घरों की दशा खराब हो चुकी थी। शहर के लोग अब धनी नहीं रह गए थे। इतिहासकार अभी तक सिन्धु घाटी सभ्यता के अंत का सही कारण नहीं समझ पाए हैं, लेकिन कुछ अनुमान लगाए गए हैं।
हड़प्पा सभ्यता के अंत के कुछ अनुमान
ऐसा हो सकता है कि नदियाँ सूख गई हों। इसके परिणामस्वरूप लोगों को दूसरी जगह जाना पड़ा होगा। ईंटो की भट्टियाँ बहुतायत में थीं। इनसे पर्यावरण को नुकसान पहुँचा होगा। इसके कारण जंगलो की कटाई हुई होगी। वनस्पति कम हो जाने के कारण लोगों को दूसरी जगह जाने के लिए बाध्य होना पड़ा होगा। मवेशियों और भेड़ो द्वारा अत्यधिक चराई के कारण वनस्पति का नुकसान हुआ होगा। इससे मरुस्थलीकरण हो गया होगा। किसी महामारी या प्राकृतिक तबाही की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इससे आबादी का एक बड़ा भाग तबाह हो गया होगा।
Sudhanshu Mishra
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