तालिबान : Taalibaan

■ तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का एक संगठन है। इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं। घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है। पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना। ■ तालिबान जिसे तालेबान के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आंदोलन है जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पश्तून में तालिबान का मतलब 'छात्र' होता है, एक तरह से यह उनकी शुरुआत मदरसों से जाहिर करता है। उत्तरी पाकिस्तान में सुन्नी इस्लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान के जन्म हुआ। ■ शीतयुद्ध के दौर में तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के स्थानीय मुजाहिदीनों (शाब्दिक अर्थ - विधर्मियों से लड़ने वाले योद्धा) को हथियार और ट्रेनिंग देकर जंग के लिए उकसाया था। नतीजन, सोवियत संघ तो हार मानकर चला गया, लेकिन अफगानिस्तान में एक कट्टरपंथी आतंकी संगठन का जन्म हो ...

NCERT History Class-7 Chapter-1 हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल। Summary

नई और पुरानी शब्दावली

ऐतिहासिक अभिलेख कई तरह की भाषाओं में मिलते हैं और ये भाषाएं भी समय के साथ-साथ बहुत बदली हैं। उदाहरण के लिए मध्य युग की फ़ारसी, आधुनिक फ़ारसी भाषा से भिन्न है। यह भिन्नता सिर्फ व्याकरण और शब्द भंडार में ही नहीं आई है, समय के साथ शब्दों के अर्थ भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए 'हिंदुस्तान' शब्द को आज हम आधुनिक राष्ट्र 'भारत' के अर्थ में लेते हैं जबकि 13वीं सदी में जब फ़ारसी के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग किया था तो उसका आशय पंजाब, हरियाणा और गंगा-यमुना के बीच में स्थित इलाकों से था। उसने इस शब्द का प्रयोग राजनीतिक अर्थ में इलाकों के लिए किया जो दिल्ली के सुलतान के अधिकार क्षेत्र में आते थे। सल्तनत के प्रसार के साथ-साथ इस शब्द के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र भी बढ़ते गए लेकिन हिंदुस्तान शब्द में दक्षिण भारत का समावेश कभी नहीं हुआ।इसके विपरीत, सोलहवीं सदी के आरंभ में बाबर ने हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग इस उपमहाद्वीप के भूगोल, पशु-पक्षियों और यहाँ के निवासियों की संस्कृति का वर्णन करने के लिए किया। इस प्रकार 'भारत' को एक भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप में पहचाना जा रहा था और हिंदुस्तान शब्द से वे राजनीतिक और राष्ट्रीय अर्थ नहीं जुड़े थे, जो हम आज जोड़ते हैं। आज विदेशी शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो भारतीय न हो। किन्तु मध्ययुग में किसी गाँव में आने वाला कोई भी अनजान व्यक्ति, जो उस समाज या संस्कृति का अंग न हो, विदेशी कहलाता था।

इतिहासकार और उनके स्रोत

इस काल के अध्ययन के लिए इतिहासकार जिन स्रोतों का प्रयोग करते हैं, उनमें आपको बहुत-सी बातें ऐसी मिलेंगी जो पिछले युग से वैसी ही चली आ रही हैं। इतिहासकार इस काल के बारे में सूचना इकट्ठी करने के लिए अभी भी सिक्को, शिलालेखों, स्थापत्य (भवन निर्माण कला) तथा लिखित सामग्री पर निर्भर रहते हैं परंतु कुछ बातें पहले से काफी भिन्न भी हैं। इस युग में प्रामाणिक लिखित सामग्री की संख्या और विविधता आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई थी। इसके आगे इतिहासकार सूचनाओं के दूसरे प्रकार के स्रोतों का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम करने लगे। इस समय के दौरान कागज क्रमशः सस्ता होता गया और इस कारण से लिखित सामग्री बड़ी मात्रा में मिलीं। लोग धर्मग्रंथ, अर्जियाँ, अदालतों के दस्तावेज, हिसाब तथा करों के खाते आदि लिखने में कागज का उपयोग करने लगे धनी व्यक्ति, शासक, जन, मठ तथा मंदिर पांडुलिपियाँ एकत्रित किया करते थे। इन पांडुलिपियों तथा दस्तावेजों से इतिहासकारों को बहुत सारी विस्तृत जानकारी मिलती है परंतु इनका उपयोग कठिन था, उन दिनों छापेखाने तो थे नहीं, इसलिए लिपिक हाथ से ही पांडुलिपियों की प्रतिकृति बनाते थे। प्रतिलिपियाँ बनाते समय लिपिक छोटे-मोटे फेरबदल करते चलते थे। सदी दर सदी प्रतिलिपियों की भी प्रतिलिपियाँ बनती रहीं और अन्ततः एक ही मूल ग्रंथ की भिन्न-भिन्न प्रतिलिपियाँ एक-दूसरे से बहुत अलग हो गईं। इससे बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई क्योंकि आज हमें लेखक की मूल पांडुलिपी शायद ही कहीं मिलती है। हमें बाद में लिपिकों द्वारा बनाई गई प्रतिलिपियों पर ही पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता है इसलिये इस बात का अंदाजा लगाने के लिए की मूलतः लेखक ने क्या लिखा था, इतिहासकारों को एक ही ग्रंथ की विभिन्न प्रतिलिपियों का अध्ययन करना पड़ता है। कई बार लेखक स्वयं भी समय-समय पर अपने मूल वृत्तान्त में संशोधन करते थे। 

नए सामाजिक और राजनीतिक समूह

सन 700 से 1750 के बीच हज़ार वर्षों का अध्ययन इतिहासकारों के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इस पूरे काल में बड़े पैमाने पर अनेक तरह के परिवर्तन हुए। इस काल मे अलग-अलग समय पर नई प्रौद्योगिकी के दर्शन होते हैं, जैसे सिंचाई में रहट, कटाई में चरखे और युद्ध में आग्नेयास्त्रों (बारूद वाले हथियार) का इस्तेमाल हुआ। इस उपमहाद्वीप में नए तरह का खान-पान भी आया जैसे- आलू, मक्का, मिर्च, चाय, कोको और कॉफ़ी। ये तमाम परिवर्तन जैसे- नई प्रौद्योगिकियाँ और फसलें उन लोगों के साथ आये जो नए विचार लेकर आये थे। यह काल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का भी काल रहा है। इस युग में लोगों की गतिशीलता भी बढ़ गयी थी। अवसर की तलाश में लोग दूर की यात्राएं करने लगे थे। इस उपमहाद्वीप में अपार संपदा और अवसर की अपार संभावनाएं मौजूद थीं। 

राजपूत

इस काल में जिन समुदायों का महत्व बढ़ा उनमें से एक समुदाय राजपूत था, जिसका नाम राजपुत्र अर्थात राजा का पुत्र से निकला है। आठवीं और चौदहवीं सदी के बीच यह नाम आमतौर पर योद्धाओं के उस समूह के लिए प्रयुक्त होता था, जो क्षत्रिय वर्ण के होने का दावा करते थे। राजपूत शब्द के अंतर्गत केवल राजा और सामंत वर्ग ही नहीं, बल्कि वे सेनापति और सैनिक भी आते थे जो पूरे उपमहाद्वीप में अलग-अलग शासकों की सेनाओं में सेवारत थे। 

अन्य समूह

इस युग में राजनीतिक दृष्टि से महत्व हासिल करने के अवसरों का लाभ मराठा, सिक्ख, जाट, अहोम और कायस्थ (मुख्यतः लिपिकों और मुंशियों का कार्य करने वाली जाति) आदि समूहों ने भी उठाया। 

सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन

इस पूरे काल के दौरान क्रमशः जंगलों की कटाई हो रही थी और खेती का इलाका बढ़ता जा रहा था। पर्यावास में परिवर्तन के कारण कई वनवासियों को मजबूर होकर अपना स्थान छोड़ना पड़ा।
  पर्यावास- इसका तात्पर्य किसी भी क्षेत्र के पर्यावरण और वहाँ के रहने वालों की सामाजिक और आर्थिक जीवन शैली से है।
    कुछ वनवासी जमीन की जुताई करने लगे और कृषक बन गए। कृषकों के ये नए समूह क्षेत्रीय बाज़ार, मुखियाओं, पुजारियों, मठों, और मंदिरों से प्रभावित होने लगे। वे बड़े और जटिल समाजों के अंग बन गए। उन्हें कर चुकाने पड़ते थे और स्थानीय मालिक वर्ग की बेगारी करनी पड़ती थी परिणामस्वरूप किसानों के बीच आर्थिक और सामाजिक अंतर उभरने लगे। कुछ के पास ज्यादा उपजाऊ जमीन होती थी, कुछ लोग मवेशी भी पालते थे और कुछ लोग खेती से खाली समय में दस्तकारी आदि भी कर लेते थे।
  दस्तकारी- इसका अर्थ हाथ से बनी कलाकृति बनाना होता है।
    जैसे-जैसे समाज में अंतर बढ़ने लगे, लोग जातियों और उपजातियों में बाँटे जाने लगे तथा उनकी पृष्ठभूमि और व्यवसाय के आधार पर उन्हें समाज में ऊँचा या नीचा दर्जा दिया जाने लगा। हालांकि ये दर्जे स्थाई नहीं होते थे। किसी जाति विशेष के सदस्यों के हाथों में कितनी सत्ता, प्रभाव और संसाधनों का नियंत्रण है, इसके आधार पर उसके दर्जे बदलते रहते थे। अपने सदस्यों के व्यवहार का नियंत्रण करने की लिए जातियाँ स्वयं अपने-अपने नियम बनाती थीं। इन नियमों का पालन जाति के बड़े- बुजुर्गों की एक सभा करवाती थी जिसे कुछ इलाकों में 'जाति पंचायत' कहा जाता था। इसके अलावा कई गाँवों पर मुखियाओं का शासन होता था।

क्षेत्र और साम्राज्य

चोल, तुग़लक़ या मुग़ल जैसे बड़े-बड़े राज्यों के अंतर्गत कई सारे क्षेत्र आ जाते थे। दिल्ली के सुलतान गयासुद्दीन बलबन (1266-1287) की प्रशंसा में एक संस्कृत प्रशस्ति में उसे एक विशाल साम्राज्य का शासक बताया गया है। इसके साम्राज्य में पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान और सम्पूर्ण दक्षिण भारत भी शामिल था। इतिहासकार इन दावों को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं। सन 700 तक कई क्षेत्रों के सामने अपने-अपने भौगोलिक आयाम तय हो चुके थे और उनकी अपनी भाषा तथा सांस्कृतिक विशेषताएँ स्पष्ट हो गई थीं। ये क्षेत्र, विशेष शासक राजवंशों से भी जुड़ गए थे। इन राज्यों के बीच काफी टकराहटें चलती रहती थीं। कभी-कभी चोल, ख़लजी, तुग़लक़ और मुग़ल जैसे राजवंश अनेक क्षेत्रों में फैला एक विशाल साम्राज्य भी खड़ा कर लेते थे। ये सभी साम्राज्य समान रूप से स्थिर या सफल नहीं हो पाते थे। 18वीं सदी में मुग़ल वंश पतन के ढलान पर था फलस्वरूप क्षेत्रीय राज्य फिर उभरने लगे लेकिन वर्षों से जो सर्वक्षेत्रीय साम्राज्यों का शासन चल रहा था उससे क्षेत्रों की प्रकृति बदल गयी थी। उन पर कई छोटे-बड़े राज्यों का शासन चल रहा था और उन राज्यों की बहुत-सी बातें इस उपमहाद्वीप के अधिकतर भाग पर फैले इन क्षेत्रों को विरासत में मिली थीं। इस तथ्य का पता हमें उन कई परंपराओं से लगता है, जो इन क्षेत्रों में उभरी थीं। इन परंपराओं में कुछ एक-दूसरे से भिन्न और कुछ एक समान थीं। ऐसी परंपराएँ हमें प्रशासन, अर्थव्यवस्था के प्रबंधन, उच्च संस्कृति तथा भाषा के संदर्भ में मिलती हैं। सन 700 से 1750 के बीच के हजार वर्षों में इन विभिन्न क्षेत्रों की प्रकृति एक-दूसरे से कटकर अलग-अलग नहीं पनपी थीं। हालांकि उनके चरित्र की अपनी विशेषताएँ बनी रही थीं मगर समन्वय की क्षेत्रीय ताकतों का प्रभाव भी उन पर पड़ा था। 

पुराने और नए धर्म

इतिहास की जिन हजार वर्षों की चर्चा हम कर रहे हैं, इन वर्षों के दौरान धार्मिक परंपराओं में कई बड़े परिवर्तन आए। दैविक तत्व में लोगों की आस्था कभी-कभी बिल्कुल ही वैयक्तिक स्तर पर होती थी, परंतु आमतौर पर इस आस्था का स्वरूप सामूहिक होता था। किसी दैविक तत्व में सामूहिक आस्था यानि धर्म प्रायः स्थानीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक संगठन से संबंधित होती थी। जैसे-जैसे इन समुदायों का सामाजिक संसार बदलता गया वैसे ही इनकी आस्थाओं में भी परिवर्तन आता गया।

हिन्दू धर्म में परिवर्तन 

हिन्दू धर्म में इस युग में महत्वपूर्ण बदलाव आए जैसे- नए देवी-देवताओं की पूजा, राजाओं द्वारा मंदिरों का निर्माण और समाज में पुरोहितों के रूप में ब्राह्मणों का बढ़ता महत्व आदि। संस्कृत ग्रंथों के ज्ञान के कारण समाज मे ब्राह्मणों का बड़ा आदर होता था। इनके संरक्षक नए शासक थे, जो स्वयं प्रतिष्ठा की चाह में थे। इन संरक्षकों का समर्थन होने के कारण समाज में इनका दबदबा और भी बढ़ गया। 

भक्ति की अवधारणा

इस युग मे एक महत्वपूर्ण परिवर्तन भक्ति की अवधारणा के रूप में आया। इसमें ईश्वर की कल्पना एक ऐसे प्रेमल ईष्ट देवी-देवता के रूप में की गयी थी जिस तक पुजारियों के कर्मकाण्ड के बिना ही भक्त स्वयं पहुँच सकते थे।

नए धर्मों का आगमन 

इस युग में इस उपमहाद्वीप में नए धर्मों का आगमन हुआ। कुरान शरीफ का संदेश भारत में सबसे पहले सातवीं सदी में व्यापारियों और अप्रवासियों के जरिये पहुँचा। मुसलमान कुरान शरीफ को अपना धर्मग्रंथ मानते हैं, केवल एक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। कई शासक इस्लाम और इसके विद्वान धर्मशास्त्रियों अर्थात उलेमाओं को संरक्षण देते थे। हिन्दू धर्म की ही भांति इस्लाम के अनुयायी भी अपने धर्म की अलग-अलग तरह से व्याख्या करते थे। मुसलमानों में कुछ शिया थे जो पैगम्बर साहब के दामाद अली को मुसलमानों का विधिसम्मत नेता मानते थे, और कुछ सुन्नी थे जो खलीफाओं के प्रभुत्व को स्वीकार करते थे। इस्लाम के आरंभिक दौर में इस धर्म का नेतृत्व करने वाले खलीफा कहलाते थे और आगे भी इनकी परंपरा चलती रही। इस्लामी न्याय सिद्धांत (विशेषकर भारत में हनफ़ी और शफ़ी ऐसे सिद्धांत हैं) कि विभिन्न परंपराओं में भी महत्वपूर्ण अंतर रहे हैं। ऐसे ही धर्म सिद्धांतों तथा रहस्यवादी विचारों को लेकर विभिन्नताएं देखने को मिलती है। 

समय और इतिहास के कालखण्डों पर विचार

यदि अतीत को समान विशेषता रखने वाले कुछ बड़े-बड़े हिस्सों, युगों या कालों में बाँट दिया जाए तो समय का अध्ययन कुछ आसान हो जाता है। 19वीं सदी के मध्य में अंग्रेज इतिहासकारों ने नए भारत के इतिहास को तीन युगों में बाँटा था-
●हिन्दू
●मुस्लिम
●ब्रिटिश
यह काल विभाजन इस विचार पर आधारित था कि शासकों का धर्म ही एकमात्र महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन होता है और अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति में और कोई भी महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आता। इस दृष्टिकोण में उपमहाद्वीप की विविधता की भी उपेक्षा हो जाती थी। इस काल विभाजन को आज बहुत कम इतिहासकार ही स्वीकार करते हैं  अधिकतर इतिहासकार आर्थिक तथा सामाजिक कारकों के आधार पर ही अतीत के विभिन्न कालखंडों की विशेषताएं तय करते हैं। मध्यकाल की तुलना प्रायः आधुनिक काल से की जाती है आधुनिकता के साथ भौतिक उन्नति और बौद्धिक प्रगति का भाव जुड़ा हुआ है। इससे आशय यह निकलता है कि मध्यकाल रूढ़िवादी था और उस दौरान कोई परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन ऐसा नहीं था, इन हजार वर्षों के दौरान इस उपमहाद्वीप के समाजों में प्रायः परिवर्तन आते रहे। कई क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था तो इतनी समृद्ध हो गई थी कि उसने यूरोप की व्यापारी कंपनियों को भी आकर्षित करना आरंभ कर दिया था। 

Sudhanshu Mishra

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