बारहवीं शताब्दी में दिल्ली एक महत्वपूर्ण शहर बना।दिल्ली के सुलतान
राजपूत वंश
●तोमर आरंभिक बारहवीं शताब्दी - 1165
●अनंगपाल 1130 - 1145
●चौहान 1165 - 1192
●पृथ्वीराज चौहान 1175 - 1192
प्रारंभिक तुर्की शासक (1206 - 1290)
●कुतुबुद्दीन ऐबक 1206 - 1210
●शमसुद्दीन इल्तुतमिश 1210 - 1236
●रज़िया 1236 - 1240
●गयासुद्दीन बलबन 1266 - 1287
ख़लजी वंश (1290 - 1320)
●जलालुद्दीन ख़लजी 1290 - 1296
●अलाउद्दीन ख़लजी 1296 - 1316
तुग़लक़ वंश (1320 - 1414)
●गयासुद्दीन तुग़लक़ 1320 - 1324
●मुहम्मद तुग़लक़ 1324 - 1351
●फ़िरोजशाह तुग़लक़ 1351 - 1388
सैय्यद वंश (1414 - 1451)
●खिज्र खान 1414 - 1421
लोदी वंश (1451 - 1526)
●बहलोल लोद 1451-1489
सबसे पहले राजपूतों के काल में दिल्ली किसी साम्राज्य की राजधानी बनी। बारहवीं सदी के मध्य में तोमरों को अजमेर के चौहानों (चाहमानों) ने परास्त किया। तोमरों और चौहानों के राज्यकाल में ही दिल्ली वाणिज्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गयी। इस शहर में कई समृद्धशाली जैन व्यापारी रहते थे जिन्होंने अनेकों मंदिरों का निर्माण करवाया। यहाँ देहलीवाल कहे जाने वाले सिक्के भी ढाले जाते थे, जो काफी प्रचलन में थे।
तेरहवीं सदी के आरंभ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई और इसके साथ ही दिल्ली एक ऐसी राजधानी में बदल गई जिसका नियंत्रण एक उपमहाद्वीप के बहुत बड़े क्षेत्र पर फैला था। जिस इलाके में आज दिल्ली बसा हुआ है, वहां इन सुल्तानों ने अनेक नगर बसाए थे।
दिल्ली के सुलतानों के बारे में जानकारी
हालांकि अभिलेख, सिक्को और स्थापत्य के माध्यम से काफी सूचना मिलती है मगर और भी महत्वपूर्ण वे इतिहास, तारीख (एकवचन)/तवारीख़ (बहुवचन) हैं जो सुल्तानों के शासनकाल मे प्रशासनिक भाषा फ़ारसी में लिखे गए थे। तवारीख़ के लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारियों जैसे सुशिक्षित व्यक्ति होते थे, जो घटनाओं का वर्णन भी करते थे और शासकों को प्रशासन संबंधी सलाह भी देते थे। वे न्यायसंगत शासन के महत्व पर बल देते थे।
तवारीख़ के लेखकों से संबंधित अन्य बातें
●तवारीख़ के लेखक नगरों में (विशेषकर दिल्ली में) रहते थे।
●वे अक्सर इतिहास सुल्तानों के लिए लिखते थे। इसके बदले वे ईनाम- इकराम पाने की आशा रखते थे।
●ये लेखक अक्सर शासकों को जन्मसिद्ध अधिकार और लिंगभेद पर आधारित 'आदर्श समाज' व्यवस्था बनाए रखने की सलाह देते थे।
रज़िया
सन 1236 में सुलतान इल्तुतमिश की बेटी रज़िया सिंहासन पर बैठी। उस युग के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने स्वीकार किया है कि वह अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य और सक्षम थी, लेकिन फिर भी लोग एक रानी को शासक के रूप में मान्यता नहीं दे पा रहे थे। अतः सन 1240 में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।
दिल्ली सल्तनत का विस्तार
गैरिसन शहर से साम्राज्य तक
तेरहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के सुलतानों का शासन गैरिसनों (रक्षक सैनिकों की टुकड़ियों) के निवास के लिए बनें मजबूत शहरों से आगे शायद ही कभी फैला हो। शहरों से सम्बद्ध, लेकिन उनसे दूर भीतरी प्रदेशों पर उनका नियंत्रण न के बराबर था और इसलिए उन्हें आवश्यक सामग्री रसद आदि के लिए व्यापार, कर या लूटमार पर ही निर्भर रहना पड़ता था।
दिल्ली से सुदूर बंगाल और सिंध के गैरीसन शहरों पर नियंत्रण बहुत ही कठिन था। बगावत, युद्ध, यहां तक कि खराब मौसम से भी उनसे संपर्क के सूत्र छिन्न-भिन्न हो जाते थे। सल्तनत को अफगानिस्तान से आने वाले हमलावरों और उन सूबेदारों से बराबर चुनौती मिलती रहती थी, जो जरा सी कमजोरी का आभास मिलते ही विद्रोह कर देते थे। इन चुनौतियों के चलते सल्तनत बड़ी मुश्किल से किसी तरह अपने-आपको बचाए हुए थी। सल्तनत का विस्तार गयासुद्दीन बलबन, अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़लक़ के राज्यकाल में हुआ।
भीतरी सीमाओं का विस्तार
सल्तनत की भीतरी सीमाओं में जो अभियान चले उनका लक्ष्य था गैरीसन शहरों की पृष्ठभूमि में स्थित भीतरी क्षेत्रों की स्थिति को मजबूत करना। इन अभियानों के दौरान गंगा-यमुना के दोआब से जंगलों को साफ कर दिया गया और शिकारी- संग्राहकों तथा चरवाहों को उनके पर्यावास से खदेड़ दिया गया। वह जमीन किसानों को दे दी गई और कृषि कार्य को प्रोत्साहन दिया गया। व्यापारिक-मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यापार की उन्नति के खातिर नए किले और शहर बसाए गए।
बाहरी सीमाओं का विस्तार
दूसरा विस्तार सल्तनत की बाहरी सीमा पर हुआ। अलाउद्दीन ख़लजी के शासनकाल में दक्षिण भारत को लक्ष्य बनाकर सैनिक अभियान शुरू हुए। ये अभियान मुहम्मद तुग़लक़ के समय में अपनी चरम सीमा पर पहुँचे। इन अभियानों में सल्तनत की सेनाओं ने हाथी, घोड़े, गुलाम और मूल्यवान वस्तुएं कब्जे में ले लीं।
सल्तनत कालीन सेना का विस्तार
दिल्ली सल्तनत की सेनाओं की शुरुआत अपेक्षाकृत कमजोर थी, मगर डेढ़ सौ वर्ष बाद, मुहम्मद तुग़लक़ के राज्यकाल के अंत तक इस उपमहाद्वीप के कई विशाल क्षेत्र इसके युद्ध अभियान के अंतर्गत आ चुके थे। इसने शत्रुओं की सेनाओं को परास्त किया और शहरों पर कब्जा किया। इसके सूबेदार और प्रशासक मुकदमों में फैसले सुनाते थे और साथ ही किसानों से कर वसूल करते थे।
ख़लजी और तुग़लक़ वंश के अंतर्गत प्रशासन
दिल्ली सल्तनत जैसे विशाल साम्राज्य के प्रशासन के लिए विश्वसनीय सूबेदारों और प्रशासकों की जरूरत थी। दिल्ली के आरम्भिक सुलतान इल्तुतमिश, सामंतों और जमींदारों के स्थान पर अपने विशेष गुलामों को सूबेदार नियुक्त करना अधिक पसंद करते थे। इन गुलामों को फ़ारसी में बंदगाँ कहा जाता था। उन्हें राज्य के कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर काम करने के लिए बड़ी सावधानी से प्रशिक्षित किया जाता था। ये गुलाम पूरी तरह अपने मालिक पर निर्भर होते थे इसलिए सुलतान भी विश्वास करके उन पर निर्भर हो सकते थे।
ख़लजी तथा तुग़लक़ शासक भी बंदगाँ का इस्तेमाल करते रहे और साथ ही अपने पर आश्रित निम्न वर्ग के लोगों को भी ऊँचे राजनीतिक पदों पर बैठाते रहे। ऐसे लोगों को सेनापति और सूबेदार जैसे पद दिए जाते थे। लेकिन इससे राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा होने लगी। गुलाम और आश्रित अपने मालिक के प्रति वफ़ादार रहते थे परंतु उनके उत्तराधिकारियों के प्रति नहीं। अतः नए सुलतान के अपने नए नौकर होते थे। इससे नए और पुराने गुलामों या आश्रितों में टकराहटें होती थीं।
पहले के सुलतानों की ही तरह ख़लजी और तुग़लक़ शासकों ने भी सेनानायकों को भिन्न-भिन्न आकार के इलाकों के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया। ये इलाके इक्ता कहलाते थे और इन्हें संभालने वाले इक्तादार या मुक्ती कहे जाते थे। मुक्ती का कार्य सैनिक अभियानों का नेतृत्व करना और अपने इक्तों में कानून और व्यवस्था बनाए रखना था। अपनी सैनिक सेवाओं के बदले वेतन के रूप में मुक्ती अपने इलाकों में राजस्व की वसूली किया करते थे। राजस्व के रूप में मिली रकम से ही वे अपने सैनिकों को भी वेतन देते थे। इक्तादार वंशानुगत नहीं होते थे तथा इनका एक इक्ता से दूसरे इक्ता में स्थानांतरण भी होता रहता था। मुक्ती लोगों द्वारा एकत्रित किए गए राजस्व की रकम का हिसाब लेने के लिए एक लेखा अधिकारी नियुक्त किए जाता था। इक्तादारों को निर्धारित कर वसूलने और तय संख्या में सैनिक रखने के भी निर्देश दिए गए थे।
जब दिल्ली के सुलतान शहरों से दूर आंतरिक इलाकों को भी अपने अधिकार में ले आए तो उन्होंने भूमि के स्वामी सामंतों और अमीर जमींदारों को भी अपनी सत्ता के आगे झुकने पर बाध्य कर दिया। अलाउद्दीन ख़लजी के शासनकाल में स्थानीय सामंतों से कर लगाने का अधिकार छीन लिया गया तथा स्वयं उन्हें भी कर चुकाने को बाध्य किया गया। कुछ पुराने सामंतों और जमींदारों ने राजस्व के निर्धारण और वसूली अधिकारी के रूप में सल्तनत की नौकरी कर ली। उस जमाने मे तीन तरह के कर थे-
1- कृषि पर, जिसे खराज कहा जाता था, जो किसान की उपज का लगभग 50 प्रतिशत होता था।
2- मवेशियों पर
3- घरों पर
इस उपमहाद्वीप के बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली सल्तनत के अधिकार से बाहर था। दिल्ली से बंगाल जैसे सुदूर प्रान्तों। पर नियंत्रण कठिन था और दक्षिण भारत की विजय के तुरंत बाद पूरा क्षेत्र स्वतंत्र हो गया था। यहाँ तक कि गंगा के मैदानी इलाके में भी घने जंगलों वाले ऐसे क्षेत्र थे, जिनमें कब्जा करने में सुलतान की सेनाएं अक्षम थी। स्थानीय सरदारों ने इन क्षेत्रों पर अपना शासन जमा रखा था। अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़लक़ इन इलाकों पर जोर-जबरदस्ती से अपना अधिकार तो जमा लेते थे परंतु वह अधिकार कुछ समय तक ही रह पाता था।
चंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों का दिल्ली सल्तनत पर हमला
चंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों ने 1219 में उत्तर- पूर्वी ईरान में ट्रांसऑक्ससियान (आधुनिक उजबेकिस्तान) पर हमला किया और इसके शीघ्र बाद ही दिल्ली सल्तनत पर मंगोलों ने धावा बोला। अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़लक़ के शासन कालों के आरंभ में दिल्ली पर मंगोलों के धावे बढ़ गए इससे मजबूर होकर दोनों ही सुलतानों को एक विशाल स्थानीय सेना खड़ी करनी पड़ी। इतनी विशाल सेना को संभालना भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती था। सल्तनत के इतिहास में पहली बार दिल्ली के किसी सुलतान ने मंगोल इलाके में फ़तह करने की योजना बनाई थी। जहाँ अलाउद्दीन ख़लजी का बल स्वयं की रक्षा पर था, वहीं मुहम्मद तुग़लक़ के द्वारा उठाए गए कदम मंगोलों के विरुद्ध सैनिक आक्रमण की योजना का हिस्सा थे।
पंद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में सल्तनत
तुग़लक़ वंश के बाद 1526 तक दिल्ली तथा आगरा पर सैय्यद तथा लोदी वंशों का राज्य रहा। तब तक जौनपुर, बंगाल, मालवा, गुजरात, राजस्थान तथा पूरे दक्षिण भारत में स्वतंत्र शासक उठ खड़े हुए। उनकी राजधानियाँ समृद्ध थीं और राज्य फल-फूल रहे थे। इसी काल में अफगान तथा राजपूतों जैसे नए शासक सम्राट भी उभरे।
इस काल में स्थापित राज्यों में से कुछ छोटे तो थे पर शक्तिशाली थे और उनका शासन बहुत ही कुशल तथा सुव्यवस्थित तरीके से चल रहा था। शेरशाह सूरी (1540 - 1545) ने बिहार में अपने चाचा के एक छोटे से इलाके में प्रबंधक के रूप में काम शुरू किया था और आगे चलकर उसने इतनी उन्नति की कि मुग़ल सम्राट हुमायूँ (1530 - 1540, 1555 - 1556) तक को चुनौती दी और परास्त किया। शेरशाह ने दिल्ली पर अधिकार करके स्वयं अपना राजवंश स्थापित किया। हालांकि सूरी वंश ने केवल 15 वर्ष ही शासन किया, लेकिन इसने प्रशासन में अलाउद्दीन ख़लजी वाले कई तरीको को अपनाकर उन्हें और भी चुस्त बना दिया। महान सम्राट अकबर (1556 - 1605) ने जब मुग़ल साम्राज्य को एकीकृत किया, तो उसने अपने प्रतिमान के रूप में शेरशाह की प्रशासन व्यवस्था को ही अपनाया था।
Sudhanshu Mishra
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