तालिबान : Taalibaan

■ तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का एक संगठन है। इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं। घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है। पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना। ■ तालिबान जिसे तालेबान के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आंदोलन है जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पश्तून में तालिबान का मतलब 'छात्र' होता है, एक तरह से यह उनकी शुरुआत मदरसों से जाहिर करता है। उत्तरी पाकिस्तान में सुन्नी इस्लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान के जन्म हुआ। ■ शीतयुद्ध के दौर में तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के स्थानीय मुजाहिदीनों (शाब्दिक अर्थ - विधर्मियों से लड़ने वाले योद्धा) को हथियार और ट्रेनिंग देकर जंग के लिए उकसाया था। नतीजन, सोवियत संघ तो हार मानकर चला गया, लेकिन अफगानिस्तान में एक कट्टरपंथी आतंकी संगठन का जन्म हो ...

NCERT History Clase-8 Chapter-2 व्यापार से साम्राज्य तक कंपनी की सत्ता स्थापित होती है। Summary

● प्रमुख बादशाहों में औरंगजेब आखिरी शक्तिशाली बादशाह थे। उन्होंने वर्तमान भारत के एक बहुत बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहुत सारे मुग़ल सूबेदार और बड़े-बड़े जमींदार अपनी ताकत दिखाने लगे थे। उन्होंने अपनी क्षेत्रीय रियासतें कायम कर ली थीं। जैसे-जैसे विभिन्न भागों में ताकतवर क्षेत्रीय रियासतें सामने आने लगीं, दिल्ली अधिक दिनों तक प्रभावी केंद्र के रूप में नहीं रह सकी।
● अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध तक राजनीतिक क्षितिज पर अंग्रेजों के रूप में नई ताकत उभरने लगी थी।

पूर्व में ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन


● सन 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से चार्टर अर्थात इजाजतनामा हासिल कर लिया, जिससे कंपनी को पूर्व में व्यापार करने का एकाधिकार मिल गया। इस इजाजतनामे का मतलब यह था कि इंग्लैंड की कोई और व्यापारिक कंपनी इस इलाके में ईस्ट इंडिया कंपनी से होड़ नहीं कर सकती थी। इस चार्टर के सहारे कंपनी समुद्र पार जाकर नए इलाकों को खंगाल सकती थी, वहां से सस्ती कीमत पर चीजें खरीदकर उन्हें यूरोप में ऊंची कीमत पर बेच सकती थी। कंपनी को दूसरी अंग्रेज व्यापारिक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का कोई भय नहीं था। उस जमाने में वाणिज्यिक कम्पनियाँ मोटे तौर पर प्रतिस्पर्धा से बचकर ही मुनाफा कमा सकती थीं। अगर कोई प्रतिस्पर्धी न हो तभी वे सस्ती चीजें खरीदकर उन्हें ज्यादा कीमत पर बेच सकती थीं।
● यह शाही दस्तावेज दूसरी यूरोपीय ताकतों को पूरब के बाजारों में आने से रोक सकता था। जब तक इंग्लैंड के जहाज अफ्रीका के पश्चिम तट को छूते हुए केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाकर हिन्द महासागर पार करते तब तक पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। वे गोवा में अपना ठिकाना बना चुके थे। पुर्तगाल के खोजी यात्री वास्को द गामा ने ही 1498 में पहली बार भारत तक पहुँचने के इस समुद्री मार्ग का पता लगाया था। सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत तक डच भी हिन्द महासागर में व्यापार की संभावनाएं तलाशने लगे थे। कुछ ही समय बाद फ्रांसीसी व्यापारी भी सामने आ गए।
● समस्या यह थी कि सारी कम्पनियाँ एक जैसी चीजें ही खरीदना चाहतीं थीं। यूरोप के बाजारों में बने बारीक सूती कपड़े और रेशम की जबरदस्त माँग थी। इनके अलावा, कालीमिर्च, लौंग, इलायची और दालचीनी की भी जबरदस्त माँग रहती थी। यूरोपीय कंपनियों के बीच इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भारतीय बाजारों में इन चीजों की कीमतें बढ़ने लगीं और उनसे मिलने वाला मुनाफा गिरने लगा। अब इन व्यापारिक कंपनियों के फलने-फूलने का यही एक रास्ता था कि वे अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को खत्म कर दें। लिहाज, बाज़ारों पर कब्जे की इस होड़ ने व्यापारिक कंपनियों के बीच लड़ाइयों की शुरुआत कर दी। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में जब भी मौका मिलता कोई सी एक कंपनी किसी दूसरी कंपनी के जहाज डुबो देती, रास्ते में रुकावटें खड़ी कर देती। यह व्यापार हथियारों की मदद से चल रहा था और व्यापारिक चौकियों को किलेबन्दी के जरिये सुरक्षित रखा जाता था।
● अपनी बस्तियों को किलेबंद करने और व्यापार में मुनाफा कमाने की इन कोशिशों के कारण स्थानीय शासकों से टकराव होने लगे। इस प्रकार, व्यापार और राजनीति को एक दूसरे से अलग रखना कंपनी के लिए मुश्किल होता जा रहा था।

बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार की शुरुआत

● पहली इंग्लिश फैक्ट्री 1651 में हुगली नदी के किनारे शुरू हुई। कंपनी के व्यापारी यहीं से अपना काम चलाते थे। इन व्यापारियों को उस जमाने में फैक्टर कहा जाता था। इस फैक्ट्री में वेयरहाउस था। यहीं पर उसके दफ्तर थे, जिनमें कंपनी के अफसर बैठते थे । जैसे-जैसे व्यापार फैला कंपनी ने सौदागरों और व्यापारियों को फैक्ट्री के आस-पास आकर बसने के लिए प्रेरित किया। 1696 तक कंपनी में इस आबादी के चारो तरफ एक किला बनाना शुरू कर दिया था। दो साल बाद कंपनी ने मुग़ल अफसरों को रिश्वत देकर तीन गाँवों कि जमींदारी भी खरीद ली। इनमें से एक गाँव कालीकाता था जो बाद में कलकत्ता बना। अब इसे कोलकाता कहा जाता है। कंपनी ने मुग़ल सम्राट औरंगजेब को इस बात के लिए भी तैयार किया कि वह कंपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार का फरमान जारी कर दे।
● कंपनी ज्यादा से ज्यादा रियायतें हासिल करने और पहले से मौजूद अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने में लगी हुई थी। उदाहरण के लिए, औरंगजेब के फरमान से केवल कंपनी को ही शुल्क मुक्त व्यापार का अधिकार मिला था। कंपनी के जो अफसर निजी तौर पर व्यापार चलाते थे उन्हें यह छूट नहीं थी। लेकिन उन्होंने भी शुल्क चुकाने से इनकार कर दिया। इससे बंगाल के राजस्व में बहुत कमी हो गई। ऐसे में भला बंगाल के नवाब मुर्शिद कुली खान विरोध क्यों न करते?

व्यापार से युद्धों तक

● अठारहवीं सदी की शुरुआत में कंपनी और बंगाल के नवाबों का टकराव काफी बढ़ गया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद बंगाल के नवाब अपनी ताकत दिखाने लगे थे। उस समय दूसरी क्षेत्रीय ताकतों की स्थिति भी ऐसी ही थी। मुर्शिद कुली खान के बाद अली वर्दी खान और उसके बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। ये सभी शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने कंपनी को रियायतें देने से मना कर दिया। व्यापार का अधिकार देने के बदले कंपनी से नजराने मांग की तथा कंपनी को सिक्के ढालने का अधिकार नहीं दिया और उसे किलेबंदी को बढ़ाने से भी रोक दिया। कंपनी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए उन्होंने दलील दी कि उसकी वजह से बंगाल सरकार की राजस्व वसूली कम होती जा रही है और नवाबों की ताकत कमजोर पड़ रही है। कंपनी टैक्स चुकाने को तैयार नहीं थी, उसके अफसरों ने अपमानजनक चिट्ठियां लिखीं और नवाबों व उनके अधिकारियों को अपमानित करने का प्रयास किया।
● कंपनी का कहना था कि स्थानीय अधिकारियों की बेतुकी माँगों से कंपनी का व्यापार तबाह हो रहा है। व्यापार तभी फल फूल सकता है जब सरकार शुल्क हटा ले। कंपनी को इस बात का भी यकीन था कि अपना व्यापार फैलाने के लिए उसे अपनी आबादी बढ़ानी होगी, गाँव खरीदने होंगे और किलों का पुनर्निर्माण करना होगा।
● ये टकराव दिनोदिन गंभीर होते गए अंततः इन टकरावों की परिणति प्लासी के युद्ध के रूप में हुई।

प्लासी का युद्ध

1756 में अली वर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। कंपनी को सिराजुद्दौला की ताकत से काफी भय था। सिराजुद्दौला की जगह कंपनी एक ऐसा कठपुतली नवाब चाहती थी जो उसे व्यापारिक रियायतें और अन्य सुविधाएं आसानी से देने में आनाकानी न करे। कंपनी ने प्रयास किया कि सिराजुद्दौला के प्रतिद्वन्दियों में से किसी को नवाब बना दिया जाए। इसमें कंपनी को कामयाबी नहीं मिली। जवाब में सिराजुद्दौला ने हुक्म दिया कि कंपनी उनके राज्य के राजनीतिक मामलों में टांग अड़ाना बंद कर दे, किलेबंदी रोके और बाकायदा राजस्व चुकाए। जब दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो अपने 30000 सिपाहियों के साथ नवाब ने कासिम बाजार में स्थित इंग्लिश फैक्ट्री पर हमला बोल दिया। नवाब की फौजों ने कंपनी के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया, गोदाम पर ताला डाल दिया, अंग्रेजों के हथियार छीन लिए और अंग्रेज जहाजों को घेरे में ले लिया। इसके बाद नवाब ने कंपनी के कलकत्ता स्थित किले पर कब्जे के लिये उधर का रुख किया।
● कलकत्ता के हाथ से निकल जाने की ख़बर सुनने पर मद्रास में तैनात कंपनी के अफसरों ने भी रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सेनाओं को रवाना कर दिया। इस सेना को नौसैनिक बेड़े की मदद भी मिल रही थी। इसके बाद नवाब के साथ लंबे समय तक सौदेबाजी चली। आखिरकार 1757 में रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला के खिलाफ कंपनी का नेतृत्व किया। नवाब सिराजुद्दौला की हार का एक बड़ा कारण था कि उसके सेनापतियों में से एक सेनापति मीर जाफर की टुकड़ियों ने इस युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। रॉबर्ट क्लाइव ने यह कहकर उसे अपने साथ मिला लिया था कि सिराजुद्दौला को हटाकर उसे नवाब बना दिया जाएगा।
● प्लासी की जंग के बाद सिराजुद्दौला को मार दिया गया और मीर जाफ़र नवाब बना। कंपनी अभी भी शासन की जिम्मेदारी संभालने को तैयार नहीं थी। उसका मूल उद्देश्य तो व्यापार को फैलाना था, अगर यह काम स्थानीय शासकों की मदद से बिना किसी लड़ाई के हो सकता था तो किसी राज्य को सीधे अपने कब्जे में लेने की क्या जरूरत थी।
● जल्दी ही कंपनी को यह अहसास होने लगा कि यह रास्ता भी आसान नहीं है। कठपुतली नवाब भी हमेशा कंपनी के इशारों पर नहीं चलते थे। आखिरकार उन्हें भी तो अपनी प्रजा की नजर में सम्मान और संप्रभुता का दिखावा करना पड़ता था।

बक्सर का युद्ध

● जब मीर जाफर ने कंपनी का विरोध किया तो कंपनी ने उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बना दिया। जब मीर कासिम परेशान करने लगा तो 1764 में बक्सर के युद्ध में मीर कासिम को हराकर पुनः मीर जाफर को नवाब बनाया गया।
● अब नवाब को हर महीने कंपनी को पांच लाख रुपये चुकाने थे। कंपनी अपने सैनिक खर्चों से निपटने, व्यापारिक जरूरतों तथा अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए और पैसा चाहती थी। 1765 में जब मीर जाफर की मृत्यु हुई तब तक कंपनी के इरादे बदल चुके थे। कठपुतली नवाबों के साथ अपने खराब अनुभवों को देखते हुए क्लाइव ने ऐलान किया कि "अब हमें खुद ही नवाब बनना पड़ेगा।"

कंपनी के अफसर नवाब के रूप में 

● कंपनी के अफसरों के नवाब बनने का मतलब यही था कि कंपनी के पास अब सत्ता और ताकत दोनों थी। कंपनी का हर कर्मचारी नवाबों की तरह जीने के ख्वाब देखने लगा था।
● प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल के असली नवाबों को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वे कंपनी के अफसरों को निजी तोहफे के तौर पर जमीन और बहुत सारा पैसा दें। खुद रॉबर्ट क्लाइव ने भारत में बेहिसाब दौलत जमा कर ली थी। 1743 में जब वह इंग्लैंड से मद्रास (वर्तमान चेन्नई) आया था तो उसकी उम्र 18 साल थी। 1767 में जब वह दो बार गवर्नर बनने के बाद हमेशा के लिए भारत से रवाना हुआ तो यहाँ उसकी दौलत 401102 पौंड के बराबर थी। दिलचस्प बात यह है कि गवर्नर के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में उसे कंपनी के भीतर फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम सौंपा गया था। लेकिन 1772 में ब्रिटिश संसद में उसे खुद भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपनी सफाई देनी पड़ी। सरकार को उसकी अकूत संपत्ति के स्रोत संदेहास्पद लग रहे थे। उसे भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी तो कर दिया गया लेकिन 1774 में उसने आत्महत्या कर ली।
● कंपनी के सभी अफसर क्लाइव की तरह दौलत इकट्ठा नहीं कर पाए। जिनमें से कई बहुत सारी बीमारियों और लड़ाई के कारण कम उम्र में ही मौत का निवाला बन गए। इसके अलावा उन सभी को भ्रष्ट और बेईमान मानना भी सही नहीं होगा। उनमें से बहुत सारे अफसर साधारण परिवारों से आए थे। इनकी सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि वे भारत में ठीक-ठाक पैसा कमाएं और ब्रिटेन में आराम की ज़िंदगी बसर करें। जो जीते जी धन-दौलत लेकर वापस लौट गए उन्होंने ब्रिटेन में आलीशान जीवन जिया। उन्हें वहाँ के लोग 'नबाब' कहते थे। यह शब्द भारतीय शब्द नवाब' का ही अंग्रेजी संस्करण बन गया था। उन्हें लोग अक्सर नए अमीरों और सामाजिक हैसियत में रातो-रात ऊपर आने वाले लोगों के रूप में देखते थे। नाटकों और कार्टूनों में उनका मजाक उड़ाया जाता था।

कंपनी के शासन का विस्तार

● यदि हम 1757 से 1857 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा भारतीय राज्यों पर कब्जे की प्रक्रिया को देखें तो कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। किसी अनजान इलाके में कंपनी ने सीधे सैनिक हमला प्रायः नहीं किया। उसने किसी भी भारतीय रियासत के अधिग्रहण करने से पहले विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक साधनों का इस्तेमाल किया।
● बक्सर की लड़ाई (1764) के बाद कंपनी ने भारतीय रियासतों में रेजिडेंट तैनात कर दिए। ये कंपनी के राजनीतिक या व्यावसायिक प्रतिनिधि होते थे। उनका काम कंपनी के हितों की रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना था। रेजिडेंट के माध्यम से कंपनी के अधिकारी भारतीय राज्यों के भीतरी मामलों में भी दखल देने लगे थे। अगला राजा कौन होगा, किस पद पर किसको बिठाया जाएगा, इस तरह की चीजें भी कंपनी के अफसर ही तय करना चाहते थे।

सहायक संधि

कई बार कंपनी ने रियासतों पर सहायक संधि भी थोप दी। जो रियासत इस बंदोबस्त को मान लेती थी उसे कंपनी की तरफ से सुरक्षा मिलती थी और सहायक सेना के रखरखाव के लिए वह कंपनी को पैसा देती थी। अगर भारतीय शासक रकम अदा करने में चूक जाते थे तो जुर्माने के तौर पर उनका इलाका कंपनी अपने कब्जे में ले लेती थी। उदाहरण के लिए, जब रिचर्ड वेलेजली गवर्नर जनरल (1708 - 1805) थे, उस समय अवध के नवाब को 1801 में अपना आधा इलाका कंपनी को सौंपने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि नवाब सहायक सेना के लिए पैसा अदा करने में चूक गए थे। इसी आधार पर हैदराबाद के भी कई इलाके छीन लिए गए।

टीपू सुल्तान -  शेर-ए-मैसूर

● जब कंपनी को अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों पर खतरा दिखाई दिया तो कंपनी ने प्रत्यक्ष सैनिक टकराव का भी रास्ता अपनाया। दक्षिण भारतीय राज्य मैसूर के उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है।
● हैदर अली (शासन काल 1761 से 1782) और उनके विख्यात पुत्र टीपू सुल्तान (शासन काल 1782 से 1799) जैसे शक्तिशाली शासकों के नेतृत्व में मैसूर काफी ताकतवर हो चुका था। मालाबार तट पर होने वाला व्यापार मैसूर रियासत के नियंत्रण में हो चुका था, जहाँ से कंपनी काली मिर्च और इलायची खरीदती थी। 1785 में टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत में पड़ने वाले बंदरगाहों से चंदन की लकड़ी, काली मिर्च और इलायची का निर्यात रोक दिया। सुल्तान ने स्थानीय सौदागरों को भी कंपनी के साथ कारोबार करने से रोक दिया था। टीपू सुल्तान ने भारत में रहने वाले फ्रांसीसी व्यापारियों से घनिष्ठ संबंध विकसित किए और उनकी मदद से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया।
● सुल्तान के इन कदमों से अंग्रेज आग-बबूला हो गए। उन्हें हैदर अली और टीपू सुल्तान बहुत महत्वाकांक्षी, घमंडी और खतरनाक दिखाई देते थे। अंग्रेजों को लगता था कि ऐसे राजाओं को नियंत्रित करना और कुचलना जरूरी है। फलस्वरूप मैसूर के साथ अंग्रेजों की चार बार (1767-69, 1780-84, 1790-92 और 1799) जंग हुई। श्रीरंगपट्टनम की आखिरी जंग में कंपनी को सफलता मिली। अपनी राजधानी की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारे गए और मैसूर का कामकाज पुराने वोडियार राजवंश के हाथों में सौंप दिया गया। इसके साथ ही मैसूर पर भी सहायक संधि थोप दी गई।

मराठों से लड़ाई

● अठारहवीं शताब्दी के आखिर से कंपनी मराठों की ताकत को भी काबू करने और खत्म करने के बारे में सोचने लगी थी। 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में हार के बाद दिल्ली से देश का शासन चलाने का मराठों का सपना चूर-चूर हो गया। उन्हें कई राज्यों में बाँट दिया गया। इन राज्यों की बागडोर सिंधिया, होलकर, गायकवाड़ और भोंसले जैसे अलग-अलग राजवंशों के हाथों में थी। ये सारे सरदार एक पेशवा (सर्वोच्च मंत्री) के अंतर्गत एक कंफेडरेसी (राज्यमंडल) के सदस्य थे। पेशवा इस राज्यमंडल का सैनिक और प्रशासकीय प्रमुख होता था और पुणे में रहता था। महादजी सिंधिया और नाना फड़नवीस अठारहवीं सदी के आखिर के दो प्रसिद्ध मराठा योद्धा और राजनीतिज्ञ थे।
● एक के बाद एक कई युद्धों में कंपनी ने मराठों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। पहला युद्ध 1782 में सालबाई संधि के साथ खत्म हुआ जिसमें कोई पक्ष जीत नहीं पाया। दूसरा अंग्रेज मराठा युद्ध 1803-05) कई मोर्चों पर लड़ा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि उड़ीसा और यमुना के उत्तर में स्थित आगरा व दिल्ली सहित कई भूभाग अंग्रेजों के कब्जे में आ गए। अंततः 1817-19 के तीसरे अंग्रेज मराठा युद्ध में मराठों  की ताकत को पूरी तरह कुचल दिया गया। पेशवा को पुणे से हटाकर कानपुर के पास बिठूर में पेंशन पर भेज दिया गया। अब विंध्य के दक्षिण में स्थित पूरे भूभाग पर कंपनी का नियंत्रण हो चुका था।

सर्वोच्चता का दावा

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से कंपनी क्षेत्रीय विस्तार की आक्रामक नीति पर चल रही थी। लार्ड हेस्टिंगस (1813 से 1823 तक गवर्नर जनरल) के नेतृत्व में 'सर्वोच्चता' की एक नई नीति शुरू की गई। कंपनी का दावा था कि उसकी सत्ता सर्वोच्च है इसलिए वह भारतीय रियासतों का अधिग्रहण करने या उनको अधिग्रहण की धमकी देने का अधिकार अपने पास मानती थी। यह सोच बाद में भी अंग्रेजों की नीतियों में दिखाई देती रही।

विलय नीति

● अधिग्रहण की आखिरी लहर 1848 से 1856 के बीच गवर्नर-जनरल बने लार्ड डलहौजी के शासन काल में चली। लार्ड डलहौजी ने एक नई नीति अपनाई जिसे विलय नीति का नाम दिया गया। यह सिद्धांत इस तर्क पर आधारित था कि अगर किसी शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई पुरुष वारिस नहीं है तो उसकी रियासत हड़प ली जाएगी यानि कंपनी के भूभाग का हिस्सा बन जाएगी। इस सिद्धांत के आधार पर एक के बाद एक कई रियासतें - सतारा (1848), संबलपुर (1850), उदयपुर (1852), नागपुर (1853) और झांसी (1854) - अंग्रेजों के हाथ में चली गई।
● आखिरकार 1856 में कंपनी ने अवध को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। इस बार अंग्रेजों ने यह तर्क दिया कि वे अवध की जनता को नवाब के कुशासन से आजाद कराने के लिए कर्तव्य से बंधे हुए हैं इसलिए वे अवध पर कब्जा करने को मजबूर हैं। अपने प्रिय नवाब को इस तरह से गद्दी से हटाए जाने की प्रक्रिया देखकर लोगों का गुस्सा भड़क उठा और अवध के लोग भी 1857 के महान विद्रोह में शामिल हो गए।

नए शासन की स्थापना 

● गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंगस (1773 से 1785) के समय तक आते-आते कंपनी न केवल बंगाल बल्कि बम्बई और मद्रास में भी सत्ता हासिल कर चुकी थी। ब्रिटिश इलाके मोटे तौर पर प्रशासकीय इकाइयों में बँटे हुए थे जिन्हें प्रेजीडेंसी कहा जाता था। उस समय तीन प्रेजीडेंसी थीं - बंगाल, मद्रास और बम्बई। हर एक का शासन गवर्नर के पास होता था। सबसे ऊपर गवर्नर जनरल होता था। वॉरेन हेस्टिंगस ने कई प्रशासकीय सुधार किए। न्याय के क्षेत्र में उसके सुधार खासतौर से उल्लेखनीय थे।
● 1772 से एक नई न्याय व्यवस्था स्थापित की गई। इस व्यवस्था में प्रावधान किया गया कि हर जिले में दो अदालतें होंगी - फौजदारी अदालत और दीवानी अदालत। दीवानी अदालतों के मुखिया यूरोपीय जिला कलेक्टर होते थे। मौलवी और हिन्दू पंडित उनके लिए भारतीय कानूनों की व्याख्या करते थे। फौजदारी अदालतें अभी भी काज़ी और मुफ़्ती के ही अंतर्गत थीं लेकिन वे भी कलेक्टर की निगरानी में काम करते थे।
● एक बड़ी समस्या यह थी कि ब्राह्मण पंडित धर्मशास्त्र की अलग-अलग शाखाओं के हिसाब से स्थानीय कानूनों की अलग अलग व्याख्या कर देते थे। इस भिन्नता को खत्म करके समरूपता लाने के लिए 1775 में 11 पंडितों को भारतीय कानूनों का संकलन तैयार करने का काम सौंपा गया। एन• बी• हालहेड ने इस संकलन का अंग्रेजी में अनुवाद किया। 1778 तक यूरोपीय न्यायाधीशों के लिए मुस्लिम कानूनों की भी एक संहिता तैयार कर ली गई थी। 1773 कि रेग्युलेटिंग ऐक्ट के तहत एक नए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई। इसके अलावा कलकत्ता में अपीलीय अदालत सदर निजामत अदालत की भी स्थापना की गई।
● भारतीय जिले में कलेक्टर सबसे बड़ा ओहदा होता था। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, उसका मुख्य काम लगान और कर इकट्ठा करना तथा न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों व दरोगा की सहायता से जिले में कानून व्यवस्था बनाए रखना होता था। उसका कार्यालय 'कलेक्टरेट' सत्ता और संरक्षण का नया केंद्र बन गया था जिसने पुराने सत्ता केंद्रों को हाशिये पर ढकेल दिया।

कंपनी की फौज

● कंपनी के साथ भारत में शासन और सुधार के नए विचार आए लेकिन उसकी असली सत्ता सैनिक ताकत में थी। अठारहवीं सदी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना के लिए भर्ती शुरू की तो उसने पेशेवर सैनिक प्रशिक्षण के तरीके को अपनाया। अंग्रेज अपनी सेना को सिपॉय आर्मी कहते थे, जो भारतीय शब्द सिपाही से ही बना है।
● 1820 के दशक से जैसे-जैसे युद्ध तकनीक बदलने लगी कंपनी की सेना में घुड़सवार टुकड़ियों की जरूरत कम होती गई। इसकी वजह यह थी कि ब्रिटिश साम्राज्य बर्मा, अफगानिस्तान और मिस्र में भी लड़ रहा था जहाँ सिपाही मस्केट (तोड़ बंदूक) और मैचलॉक से लैस होते थे। कंपनी की सेना के सिपाहियों को बदलती सैनिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना पड़ता था और अब उसकी पैदल टुकड़ी ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही थी।
● उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज एक समरूप सैनिक संस्कृति विकसित करने लगे थे। सिपाहियों को यूरोपीय ढंग का प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुशासन सिखाया जाने लगा। अब उनका जीवन पहले से भी ज्यादा नियंत्रित था। इस कोशिश में कभी-कभी समस्याएं भी आ जाती थीं क्योंकि पेशेवर सिपाहियों की सेना खड़ी करने के चक्कर में अंग्रेज कई बार जाति और समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते थे। 1857 का विद्रोह हमें इसकी झलक दिखता है।

निष्कर्ष

● ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी से बढ़ते-बढ़ते एक भौगोलिक औपनिवेशिक शक्ति बन गई। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में नई भाप तकनीक आने से यह प्रक्रिया और तेज हुई। तब तक समुद्री मार्ग से भारत पहुँचने में 6-8 माह का समय लग जाता था। भाप से चलने वाले जहाजों ने यह यात्रा तीन हफ्तों में समेट दी। उसके बाद तो ज्यादा से ज्यादा अंग्रेज और उनके परिवार भारत जैसे दूर देश में आने लगे।
● 1857 तक भारतीय उपमहाद्वीप के 63 प्रतिशत भूभाग और 78 प्रतिशत आबादी पर कंपनी का सीधा शासन स्थापित हो चुका था। देश के शेष भूभाग और आबादी पर कंपनी का अप्रत्यक्ष प्रभाव था। इस प्रकार, व्यवहारिक स्तर पर ईस्ट इंडिया कंपनी पूरे भारत को अपने नियंत्रण में ले चुकी थी।

Sudhanshu Mishra

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