अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान उपमहाद्वीप में कुछ विशेष रूप से उल्लेखनीय घटनाएं घटीं। इस काल में कई स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ और मुग़ल साम्राज्य की सीमाएं बदलीं। 1765 तक एक अन्य शक्ति यानि ब्रिटिश सत्ता ने पूर्वी भारत के बड़े-बड़े हिस्सो को सफलता पूर्वक हड़प लिया था। अठारहवीं शताब्दी एक ऐसी अवधि थी, जब भारत में राजनीतिक परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत एक छोटे से समयांतराल में बड़ी तेजी से अचानक बदलनी शुरू हो गईं थीं।
मुग़ल साम्राज्य और परवर्ती मुग़लों के लिए संकट
● औरंगजेब के उत्तराधिकारियों के शासनकाल में साम्राज्य के प्रशासन की कार्य कुशलता समाप्त होने लगी। मनसबदारों के शक्तिशाली वर्गों को वश में रखना केंद्रीय सत्ता के लिए कठिन हो गया। सूबेदार के रूप में नियुक्त अभिजात अक्सर राजस्व और सैन्य प्रशासन दोनों कार्यालयों पर नियंत्रण रखते थे। इससे मुग़ल साम्राज्य के विशाल क्षेत्रों पर उन्हें विस्तृत राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य शक्तियाँ मिल गईं। जैसे-जैसे सुबेदारों ने प्रान्तों पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ किया वैसे-वैसे राजधानी में पहुँचने वाले राजस्व की मात्रा में कमी आती गई।
● उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के अनेक हिस्सों में हुए जमींदारों और किसानों के विद्रोहों और कृषक आंदोलनों ने इन समस्याओं को और भी गंभीर बना दिया। पहले भी विद्रोही समूहों ने मुग़ल सत्ता को चुनौती दी थी। परंतु अब ऐसे समूहों ने क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों का प्रयोग अपनी स्तिथियों को मजबूत करने के लिए किया। औरंगजेब के उत्तराधिकारी इन विद्रोहों को रोकने में असफल रहे।
● अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों का ताँता लगा रहा। उसने 1748 से 1761 के बीच पाँच बार उत्तरी भारत पर आक्रमण करके लूटपाट मचाई।
● साम्राज्य पर सब ओर से दबाव तो पड़ ही रहा था साथ ही अभिजातों के विभिन्न समूहों की पारस्परिक प्रतिद्वंदिता से उसे और भी कमजोर बना डाला। ये अभिजात दो बड़े गुटों ईरानी और तूरानी में बँटे हुए थे। काफी समय तक परवर्ती मुग़ल बादशाह इनमें से एक या दूसरे समूह के हाथों की कठपुतली बने रहे। बेहद अपमानजनक स्थिति तब पैदा हो गई, जब दो मुग़ल बादशाहों फर्रुखसियर और आलमगीर द्वितीय की हत्या हो गई और दो अन्य बादशाहों अहमद शाह अब्दाली और शाह आलम द्वितीय को उनके अभिजातों ने अंधा कर दिया।
नए राज्यों का उदय
अठारहवीं शताब्दी के दौरान मुग़ल साम्राज्य धीरे-धीरे कई स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों में बिखर गया। मोटे तौर पर अठारहवीं शताब्दी के राज्यों को तीन समूहों में बाँटा जा सकता है-
1- अवध, बंगाल और हैदराबाद वे राज्य थे जो पहले मुग़ल प्रान्त थे, हालांकि इन राज्यों के शासक अत्यंत शक्तिशाली थे और काफी हद तक स्वतंत्र थे, उन्होंने मुग़ल बादशाह से औपचारिक तौर पर अपने संबंध नहीं तोड़े।
2- ऐसे राज्य जो मुग़लों के पुराने शासनकाल में वतन जागीरों के रूप में काफ़ी स्वतंत्र थे। इनमें कई राजपूत प्रदेश भी शामिल थे।
3- तीसरी श्रेणी में मराठों और सिक्खों तथा जाटों के राज्य आते हैं। ये विभिन्न आकार के थे और इन्होंने कड़े लंबे सशस्त्र संघर्ष के बाद मुग़लों से स्वतंत्रता छीनकर ली थी।
पुराने मुग़ल प्रांत
पुराने मुग़ल प्रांतों से जिन उत्तराधिकारी राज्यों का उदय हुआ, उनमें से तीन राज्य अवध, बंगाल और हैदराबाद प्रमुख थे। ये तीनों राज्य उच्च मुग़ल अभिजातों द्वारा स्थापित किए गए थे।
हैदराबाद
● निजाम-उल-मुल्क आसफ़जाह, जिसने हैदराबाद राज्य की स्थापना की थी, मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर के दरबार का एक अत्यंत शक्तिशाली सदस्य था। उसे सर्वप्रथम अवध की सूबेदारी सौंपी गई थी और बाद में उसे दक्कन का कार्यभार दे दिया गया था। 1720-22 के मध्य ही दक्कन प्रांतों का सूबेदार होने की वजह से आसफ़जाह के पास पहले से ही राजनीतिक और वित्तीय प्रशासन का पूरा नियंत्रण था। दक्कन में होने वाले उपद्रवों और मुग़ल दरबार में चल रही प्रतिस्पर्धा का फायदा उठाकर उसने सत्ता हथियाई तथा उस क्षेत्र का वास्तविक शासक बन गया।
● हैदराबाद राज्य पश्चिम की ओर मराठों के विरुद्ध और पठारी क्षेत्र के स्वतंत्र तेलुगु सेनानायकों के साथ युद्ध करने में सदा संलग्न रहता था। पूर्व दिशा में निजाम-उल-मुल्क आसफ़जाह कोरोमंडल तट पर स्थित वस्त्रोपादक धन सम्पन्न क्षेत्र पर अपना नियंत्रण प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा रखता था, परंतु उसकी इस महत्वाकांक्षा पर उस क्षेत्र में ब्रिटिश शक्ति की उपस्थिति के कारण रोक लग गई।
अवध
● बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान को 1722 में अवध का सूबेदार नियुक्त किया गया था। अवध एक समृद्धशाली प्रदेश था, जो गंगा नदी के उपजाऊ मैदान में फैला हुआ था और उत्तरी भारत तथा बंगाल के बीच व्यापार का मुख्य मार्ग उसी में से होकर गुजरता था। बुरहान-उल-मुल्क ने भी अवध की सूबेदारी, दीवानी और फ़ौजदारी एक साथ अपने हाथ में ले ली और सूबे के राजनीतिक, वित्तीय और सैनिक मामलों का एकमात्र कर्ता धर्ता बन गया।
● बुरहान-उल-मुल्क ने अनेक राजपूत जमींदारियों और रुहेलखंड के अफगानों की उपजाऊ भूमियों को अपने राज्य में मिला लिया था।
बंगाल
● मुर्शीद कुली खान के नेतृत्व में बंगाल धीरे-धीरे मुग़ल नियंत्रण से अलग हो गया। मुर्शीद कुली खान बंगाल के नायब थे यानि कि प्रांत के सूबेदार प्रतिनियुक्त था। यद्यपि मुर्शीद कुली खान औपचारिक रूप से सूबेदार कभी नहीं बना। उसने बहुत जल्द सूबेदार के पद से जुड़ी हुई सत्ता अपने हाथ में ले ली। हैदराबाद और अवध के शासकों की तरह उसने भी राजस्व प्रशासन पर नियंत्रण जमाया।
● राज्य और सूबेदारों के बीच हैदराबाद और अवध में जो घनिष्ठ संबंध था, वह अलीवर्दी खान के शासन काल (1740-1756) में बंगाल में भी स्पष्ट दिखाई दिया।
राजपूतों की वतन जागीरी
● बहुत-से राजपूत घराने विशेष रूप से अम्बर और जोधपुर के राजघराने मुग़ल व्यवस्था में विशिष्टता के साथ सेवारत रहे थे। बदले में उन्हें अपनी वतन जागीरों पर पर्याप्त स्वायत्तता का आनंद लेने की अनुमति मिली हुई थी। अब अठारहवीं शताब्दी में इन शासकों ने अपने आस-पास के इलाकों पर अपने नियंत्रण का विस्तार किया।
● इन प्रभावशाली राजपूत घरानों ने गुजरात और मालवा के लाभदायक सूबों की सूबेदारी का दावा किया। जोधपुर के राजा अजीत सिंह को गुजरात की सूबेदारी और अम्बर के सवाई राजा जयसिंह को मालवा की सूबेदारी मिल गई। बादशाह जहांदार शाह ने 1713 में इन राजाओं के इन पदों का नवीनीकरण कर दिया।
● जोधपुर के राजघराने ने नागौर को जीत लिया और अपने राज्य में मिला लिया। दूसरी ओर अम्बर ने बूंदी के बड़े-बड़े हिस्सो पर अपना कब्जा कर लिया। सवाई राजा जयसिंह ने जयपुर में अपनी नई राजधानी स्थापित की और उसे 1722 में आगरा की सूबेदारी दे दी गई। 1740 के दशक से राजस्थान में मराठों के अभियानों ने इन रजवाड़ों पर भारी दबाव डालना शुरू कर दिया, जिससे उनका उनका विस्तार आगे होने से रुक गया।
मुग़लों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के प्रयास
सिक्ख
● सत्रहवीं शताब्दी के दौरान सिक्ख एक राजनीति समुदाय के रूप में गठित हो गए। इससे पंजाब के क्षेत्रीय राज्य-निर्माण को बढ़ावा मिला। गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना के पूर्व और उसके बाद भी राजपूत और मुग़ल शासकों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं। 1708 में गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु के बाद बंदा बहादुर के नेतृत्व में खालसा ने मुग़ल सत्ता के खिलाफ विद्रोह जारी रखे। उन्होंने बाबा गुरु नानक और गोबिंद सिंह के नामों वाले सिक्के गढ़कर अपने शासन को सार्वभौम बताया। सतलुज और यमुना नदियों के बीच के क्षेत्र में इन्होंने अपने प्रशासन की स्थापना की। 1715 में बंदा बहादुर को बंदी बना लिया गया और उसे 1716 में मार दिया गया।
● अठारहवीं शताब्दी में कई योग्य नेताओं के नेतृत्व में सिक्खों ने अपने-आपको पहले 'जत्थों' में और बाद में 'मिस्लों' में संगठित किया। इन जत्थों और मिस्लों कि संयुक्त सेनाएं 'दल खालसा' कहलाती थीं। सिक्खों ने राखी व्यवस्था स्थापित की, जिसके अंतर्गत किसानों से उनकी उपज का 20 प्रतिशत कर के रूप में लेकर बदले में उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाती थी।
● अपने सुनियोजित संगठन के कारण खालसा, पहले मुग़ल सूबेदारों के खिलाफ और फिर अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ सफल विद्रोह प्रकट कर सका।
● अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में सिक्ख इलाके सिंधु से यमुना तक फैले हुए थे। यद्यपि ये विभिन्न शासकों में बँटे हुए थे। इनमें से एक शासक महाराजा रणजीत सिंह ने विभिन्न सिक्ख समूहों में फिर से एकता कायम करके 1799 में लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।
मराठा
● मराठा राज्य एक अन्य शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था, जो मुग़ल शासन का लगातार विरोध करके उत्पन्न हुआ था। शिवाजी ने शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुखों) की सहायता से एक स्थाई राज्य की स्थापना की। अत्यंत गतिशील कृषक-पशुचारक (कुनबी) मराठों की सेना के मुख्य आधार बन गए। शिवाजी ने प्रायद्वीप में मुग़लों को चुनौती देने के लिए इस सैन्य बल का प्रयोग किया। शिवाजी की मृत्यु के बाद, मराठा राज्य में प्रभावी शक्ति, चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार के हाथ में रही, जो शिवाजी के शासन काल में पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में अपनी सेवाएँ देते रहे। पुणे मराठा राज्य की राजधानी बन गया था।
● पेशवाओं की देखरेख में मराठों ने एक अत्यंत सफल सैन्य संगठन का विकास कर लिया। उनकी सफलता का रहस्य यह था कि वे मुग़लों के किलाबंद इलाकों से टक्कर न लेते हुए, उनके पास से चुपचाप निकलकर शहरों-कस्बों पर हमला बोलते थे और मुग़ल सेना से ऐसे मैदानी इलाकों में मुठभेड़ करते थे, जहाँ रसद पाने और कुमक आने के रास्ते आसानी से रोके जा सकते थे।
● 1720 से 1761 के बीच मराठा साम्राज्य का काफी विस्तार हुआ। इससे धीरे-धीरे काफी सफलतापूर्वक मुग़ल साम्राज्य की सत्ता को क्षति पहुँची। 1720 के दशक तक मालवा और गुजरात मुग़लों से छीन लिए गए। 1730 के दशक तक मराठा नरेश को समस्त दक्कन प्रायद्वीप के अधिपति के रूप में मान्यता मिल गई साथ ही इस क्षेत्र पर चौथ और सरदेशमुखी कर वसूलने का अधिकार भी मिल गया।
● 1737 में दिल्ली पर धावा बोलने के बाद मराठा प्रभुत्व की सीमाएँ तेजी से बढ़ीं। ये उत्तर में राजस्थान और पंजाब, पूर्व में बंगाल और उड़ीसा तथा दक्षिण में कर्नाटक और तमिल एवं तेलुगु प्रदेशों तक फैल गईं। इन क्षेत्रों को औपचारिक रूप से मराठा साम्राज्य में सम्मिलित नहीं किया गया, परंतु मराठा प्रभुसत्ता को स्वीकार करने के रूप में उनसे भेंट की रकम ली जाती थी। साम्राज्य के इस विस्तार से उन्हें संसाधनों का भंडार तो मिल गया, परंतु उसके लिए उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी। मराठों के सैन्य अभियानों के कारण अन्य शासक भी उनके खिलाफ हो गए परिणामस्वरूप मराठों को 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अन्य शासकों से कोई सहायता नहीं मिली।
जाट
● अन्य राज्यों की तरह जाटों ने भी सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में अपनी सत्ता को सुदृढ़ किया। अपने नेता चूड़ामन के नेतृत्व में उन्होंने दिल्ली के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण कर लिया। 1680 के दशक तक आते-आते उनका प्रभुत्व दिल्ली और आगरा के दो शाही शहरों के बीच के क्षेत्र पर हो गया। वस्तुतः कुछ समय के लिए ये आगरा शहर के अभिरक्षक ही बन गए।
● जाट समृद्ध कृषक थे और उनके प्रभुत्व क्षेत्र में पानीपत तथा बल्लभगढ़ जैसे शहर महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गए। सूरजमल के राज में भरतपुर शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा। 1739 में जब नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला बोलकर उसे लूटा, तो दिल्ली के कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भरतपुर में शरण ली।
● भरतपुर का किला काफी हद तक पारंपरिक शैली में बनाया गया, वहीं दीग में जाटों ने अम्बर और आगरा की शैलियों का समन्वय करते हुए एक विशाल बाग-महल बनवाया। दीग की इमारतें शाहजहाँ के समय के वास्तुकला रूपों में बनी थीं।
Sudhanshu Mishra
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