जिन्हें हम क्षेत्रीय संस्कृतियाँ समझते हैं, वे समय के साथ-साथ बदली हैं और आज भी बदल रही हैं। ये क्षेत्रीय संस्कृतियाँ जटिल प्रक्रिया से विकसित हुई हैं। इस प्रक्रिया के तहत स्थानीय परंपराओं और उपमहाद्वीप के अन्य भागों के विचारों के आदान-प्रदान ने एक-दूसरे को सम्पन्न बनाया है।
चेर और मलयालम भाषा का विकास
● महोदयपुरम का चेर राज्य प्रायद्वीप के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में, जो आज के केरल राज्य का हिस्सा है, नौवीं शताब्दी में स्थापित किया। संभवतः मलयालम भाषा इस इलाके में बोली जाती थी।
● साथ-साथ चेर लोगों ने संस्कृत की परंपराओं से भी बहुत कुछ ग्रहण किया। केरल का मंदिर रंगमंच संस्कृत महाकाव्यों पर आधारित था। मलयालम भाषा की पहली साहित्यिक कृतियाँ, जो लगभग बारहवीं शताब्दी की बताई जाती हैं, प्रत्यक्ष रूप से संस्कृत की ऋणी हैं।
शासक और धार्मिक परंपराएँ (जगन्नाथी संप्रदाय)
● अन्य क्षेत्रों में क्षेत्रीय संस्कृतियाँ, क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं से विकसित हुई थीं। इस प्रक्रिया का सर्वोत्तम उदाहरण हैं पुरी, उड़ीसा में जगन्नाथ का सम्प्रदाय। आज तक जगन्नाथ की काष्ठ प्रतिमा, स्थानीय जनजातीय लोगों द्वारा बनाई जाती हैं जिससे यह तात्पर्य निकलता है कि जगन्नाथ मूलतः एक स्थानीय देवता थे, जिन्हें आगे चलकर विष्णु का रूप मान लिया गया। बारहवीं शताब्दी में गंग वंश के एक अत्यंत प्रतापी राजा अनंतवर्मन ने पुरी में पुरुषोत्तम जगन्नाथ के लिए एक मंदिर बनवाने का निश्चय किया। उसके बाद 1230 में राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना राज्य पुरुषोत्तम जगन्नाथ को अर्पित कर दिया और स्वयं को जगन्नाथ का प्रतिनियुक्त घोषित किया।
● ज्यों-ज्यों इस मंदिर को तीर्थ यात्रा के केंद्र के रूप में महत्व प्राप्त
होता गया, सामाजिक तथा राजनीतिक मामलों में भी इसकी सत्ता बढ़ती गई। जिन्होंने भी उड़ीसा को जीता, जैसे मुग़ल, मराठे और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी सबने इस मंदिर पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयत्न किया। वे सब यह महसूस करते थे कि मंदिर पर नियंत्रण प्राप्त करने से स्थानीय जनता में उनका शासन स्वीकार्य हो जाएगा।
राजपूत और शूरवीरता की परंपराएँ
● उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश लोग उस क्षेत्र को, जहाँ आज का अधिकाँश राजस्थान स्थित है, राजपूताना कहते थे। इससे यह समझा जा सकता है कि वह एक ऐसा प्रदेश था, जहाँ प्रमुख रूप से राजपूत ही रहते थे, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सत्य है। अक्सर यह माना जाता है कि राजपूतों ने राजस्थान को एक विशिष्ट संस्कृति प्रदान की।
● ये सांस्कृतिक परंपराएँ वहाँ के शासकों के आदर्शों तथा अभिलाषाओं के साथ घनिष्टता से जुड़ी हुई थीं। लगभग आठवीं शताब्दी से आज के राजस्थान के अधिकांश भाग पर विभिन्न परिवारों के राजपूत राजाओं का शासन रहा। पृथ्वीराज एक ऐसा ही शासक था। राजपूत शूरवीरों की कहानियाँ काव्यों एवं गीतों के रूप में सुरक्षित हैं। ये विशेष रूप से प्रशिक्षित चारण-भाटों द्वारा गाई जाती हैं। इन कहानियों में अक्सर नाटकीय स्थितियों और स्वामिभक्ति, मित्रता, प्रेम, शौर्य, क्रोध आदि प्रबल संवेगों का चित्रण होता था।
● इन कहानियों में स्त्रियों को भी स्थान प्राप्त था। कभी-कभी वे झगड़े के कारण के रूप में विद्यमान हैं, जब पुरुष स्त्रियों को जीतने के लिए अथवा उनकी रक्षा के लिए आपस में लड़ते थे। कहीं-कहीं यह भी चित्रित किया गया है कि स्त्रियाँ अपने शूरवीर पति का जीवन-मरण दोनों में अनुसरण करती थीं। सती प्रथा यानि विधवाओं द्वारा अपने मृतक पतियों की चिता पर जिंदा जल जाने की प्रथा का भी कुछ कहानियों में उल्लेख मिलता है। इस प्रकार जो लोग शूरवीरता के आदर्शों का पालन करते थे, उन्हें अक्सर इस आदर्श के लिए अपने जीवन का बलिदान करना होता था।
कत्थक नृत्य की कहानी
● यह नृत्य शैली उत्तर भारत के अनेक भागों से जुड़ी है। 'कत्थक' शब्द कथा शब्द से निकला है, जिसका प्रयोग संस्कृत तथा अन्य भाषाओं में कहानी के लिए किया जाता है। कत्थक मूल रूप से उत्तर भारत के मंदिरों में कथा यानि कहानी सुनाने वालों की एक जाति थी। ये कथाकार अपने हाव-भाव तथा संगीत से कथावाचन को अलंकृत किया करते थे।
● पंद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दियों में भक्ति आंदोलन के प्रसार के साथ कत्थक एक विशिष्ट नृत्य शैली का रूप धारण करने लगा। राधा-कृष्ण के पौराणिक आख्यान लोक नाट्य के रूप में प्रस्तुत किये जाते थे, जिन्हें रासलीला कहा जाता था। रासलीला में लोकनृत्य के साथ कत्थक कथाकार के मूल हाव-भाव भी जुड़े होते थे।
● मुग़ल बादशाहों और उनके अभिजातों के शासनकाल में कत्थक नृत्य राजदरबार में प्रस्तुत किया जाता था, जहाँ इस नृत्य ने अपने वर्तमान अभिलक्षण अर्जित किए और यह एक विशिष्ट नृत्य शैली के रूप में विकसित हो गया। आगे चलकर यह दो परंपराओं या 'घरानों' में फला-फूला: राजस्थान (जयपुर) के राजदरबारों में और लखनऊ में। अवध के अंतिम नवाब वाजिदअली शाह के संरक्षण में यह एक प्रमुख कला के रूप में उभरा।
● अनेक अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों की तरह कत्थक को भी उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दियों में अधिकांश ब्रिटिश प्रशासकों ने नापसंद किया। फिर भी यह जीवित बचा रहा और गणिकाओं द्वारा पेश किया जाता रहा। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद तो देश में इसे छह 'शास्त्रीय' नृत्य रूपों में मान्यता मिल गई।
संरक्षकों के लिए चित्रकला (लघुचित्रों की परंपरा)
● एक अन्य परंपरा जो कई रीतियों में विकसित हुई, वह थी लघुचित्रों की परंपरा। लघुचित्र छोटे आकार के चित्र होते हैं, जिन्हें आमतौर पर जल रंगों से कपड़े या कागज़ पर चित्रित किया जाता है। प्राचीनतम लघुचित्र, तालपत्रों अथवा लकड़ी की तख्तियों पर चित्रित किए गए। जैन ग्रंथों में भी इनका प्रयोग हुआ है। मुग़ल बादशाह अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ ने अत्यंत कुशल चित्रकारों को संरक्षण प्रदान किया था, जो प्राथमिक रूप से इतिहास और काव्यों को पांडुलिपियों में चित्रित करते थे। अक्सर उपहार के तौर पर इन चित्रों का आदान-प्रदान किया जाता था।
● मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ये चित्रकार मुग़ल दरबार छोड़कर नए उभरने वाले क्षेत्रीय राज्यों के दरबारों में चले गए। इन्होंने राजपूती दरबारों को भी प्रभावित किया।
● आधुनिक हिमाचल प्रदेश के इर्द-गिर्द हिमालय की तलहटी के इलाके में सत्रहवीं शताब्दी के बाद वाले वर्षों में लघुचित्र की एक साहसपूर्ण एवं भावप्रवण शैली का विकास हो गया, जिसे 'बसोहली' शैली कहा जाता है। यहाँ जो सबसे लोकप्रिय पुस्तक चित्रित की गई है। वह भानुदत्त की 'रसमंजरी' थी। 1739 में नादिरशाह के आक्रमण और दिल्ली विजय के परिणामस्वरूप मुग़ल कलाकार मैदानी इलाकों में अनिश्चितताओं से बचने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। उन्हें वहाँ जाते ही आश्रयदाता तैयार मिले, जिसके फलस्वरूप चित्रकारी की 'कांगड़ा शैली' विकसित हुई।
● अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक, कांगड़ा के कलाकारों ने एक नई शैली विकसित कर ली, जिसने लघुचित्रकारी में एक नई जान डाल दी। उनकी प्रेरणा का स्रोत वहाँ की वैष्णव परंपराएँ थीं। ठंडे नीले और हरे रंगों का प्रयोग और विषयों का काव्यात्मक निरूपण कांगड़ा शैली की विशेषता थी।
बंगाल
एक क्षेत्रीय भाषा का विकास
● बंगाल के लोग हमेशा से बंगाली (बंगला) भाषा ही बोलते थे। किंतु आज बंगाली, संस्कृत से निकली हुई भाषा मानी जाती है, जबकि संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से यह पता चलता है कि बंगाल के लोग संस्कृत से उपजी भाषाएं नहीं बोलते थे।
● ईसा पूर्व चौथी-तीसरी शताब्दी से बंगाल और मगध के बीच वाणिज्यिक संबंध स्थापित होने लगे थे, जिससे संभवतः बंगाल में संस्कृत का प्रभाव बढ़ता गया। चौथी शताब्दी के दौरान, गुप्तवंशीय शासकों ने उत्तरी बंगाल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और वहाँ ब्राह्मणों को बसाना शुरू कर दिया। इस प्रकार गंगा की मध्यघाटी के भाषायी तथा सांस्कृतिक प्रभाव इस क्षेत्र में अधिक प्रबल हो गए। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यह पाया कि बंगाल में सर्वत्र संस्कृत से संबंधित भाषाओं का प्रयोग हो रहा था।
● आठवीं शताब्दी से बंगाल में पाल शासकों के अंतर्गत एक क्षेत्रीय राज्य का उद्भव हो गया। चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दियों के बीच बंगाल पर सुल्तानों का शासन रहा, जो दिल्ली में स्थित शासकों से स्वतंत्र थे। 1586 में जब अकबर ने बंगाल को जीत लिया, तो उसे 'सूबा' माना जाने लगा। उस समय प्रशासन की भाषा फ़ारसी थी, लेकिन बंगाली एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही थी।
● बंगाली के प्रारंभिक साहित्य को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है एक श्रेणी संस्कृत की ऋणी है और दूसरी उससे स्वतंत्र है।
● पहली श्रेणी में संस्कृत महाकाव्यों के अनुवाद, मंगलकाव्य और भक्ति साहित्य जैसे गौड़ीय वैष्णव आंदोलन के नेता श्री चैतन्य देव की जीवनियाँ आदि शामिल हैं।
● दूसरी श्रेणी में नाथ साहित्य शामिल है जैसे- मैनमती-गोपीचंद के गीत, धर्म ठाकुर की पूजा से संबंधित कहानियाँ, परीकथाएं, लोककथाएं और गाथागीत।
● पहली श्रेणी के ग्रंथों के काल का निर्णय करना सरल है। यह पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से अठारहवीं शताब्दी के मध्य भाग तक रचे गए। जबकि दूसरी श्रेणी के काल निर्णय के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
पीर
● जब बंगाल पर मुग़लों का नियंत्रण स्थापित हो गया था तब मुग़लों ने पूर्वी डेल्टा प्रदेश के केंद्रीय भाग में स्थित ढाका नगर में अपनी राजधानी स्थापित की। अधिकारी और कर्मचारी लोग भूमि प्राप्त करके अक्सर उस पर मस्जिदें बना लेते थे, जो इन इलाकों के धार्मिक रूपांतरण केंद्रों के रूप में काम आती थीं।
● प्रारम्भ में बाहर से आकर यहाँ बसने वाले लोग इन अस्थिर परिस्थितियों में रहने के लिए कुछ व्यवस्था तथा आश्वासन चाहते थे। ये सुख-सुविधाएं तथा आश्वासन उन्हें समुदाय के नेताओं ने प्रदान कीं। ये नेता शिक्षकों और निर्णायकों की भूमिकाएँ भी अदा करते थे। कभी-कभी ऐसा समझा जाता था कि इन नेताओं के पास अलौकिक शक्तियाँ हैं। स्नेह और आदर से लोग इन्हें 'पीर' कहा करते थे। पीरों की पूजा पध्यतियाँ बहुत ही लोकप्रिय हो गईं और उनकी मजारें बंगाल में सर्वत्र पाई फैल गईं।
मंदिर
बंगाल में पंद्रहवीं शताब्दी के बाद वाले वर्षों में मंदिर बनाने का दौर जोरों पर रहा, जो उन्नीसवीं शताब्दी में आकर समाप्त हो गया। इन मंदिरों की शक्ल या आकृति बंगाल की छप्परदार झोपड़ियों की तरह दोचाला (दो छतों वाली) या चौचाला (चार छतों वाली) होती थी। इसके कारण मंदिरों की स्थापत्य कला में विशिष्ट बंगाली शैली का प्रादुर्भाव हुआ। अपेक्षाकृत अधिक जटिल चौचाला ढांचे में चार त्रिकोणीय छतें चार दीवारों पर रखी जाती थीं। मंदिर आमतौर पर एक वर्गाकार चबूतरे पर बनाए जाते थे। उनके भीतरी भाग में कोई सजावट नहीं होती थी, लेकिन अनेक मंदिरों की बाहरी दीवारें चित्रकारियों, सजावटी टाइलों अथवा मिट्टी की पट्टियों से सजी होती थीं। कुछ मंदिरों में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में विष्णुपुर के मंदिरों में ऐसी सजावटें अत्यंत उत्कृष्ट कोटि तक पहुँच चुकी थीं।
मछली (भोजन के रूप में)
● परंपरागत भोजन संबंधी आदतें, आमतौर पर स्थानीय रूप से उपलब्ध खाद्य पदार्थों पर निर्भर करती हैं। बंगाल एक नदीय मैदान है, जहाँ मछली और धान की उपज बहुतायत से होती है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इन दोनों वस्तुओं को गरीब बंगालियों की भोजन सूची में भी प्रमुख स्थान प्राप्त है। मछली पकड़ना यहाँ का प्रमुख धंधा रहा है और बंगाली साहित्य में मछली का कई जगहों पर उल्लेख मिलता है। इससे ज्यादा और क्या होगा कि मंदिरों और बौद्ध विहारों की दीवारों पर जो मिट्टी की पट्टियाँ लगी हैं, उनमें भी मछलियों को साफ करते हुए और टोकरियों में भरकर बाज़ार ले जाते हुए दर्शाया गया है।
● स्थानीय आहार में मछली को लोकप्रियता को देखते हुए ब्राह्मण धर्म के विशेषज्ञों ने भी बंगाली ब्राह्मणों के लिए मछली के निषेध में ढील दी दी। बृहदधर्म पुराण (बंगाल में रचित तेरहवीं शताब्दी का संस्कृत ग्रंथ) में स्थानीय ब्राह्मणों को कुछ खास किस्मों की मछली खाने की अनुमति दे दी गई थी।
Sudhanshu Mishra
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