इतिहास में तारीख महत्व
● एक वक्त था जब इतिहासकार तारीखों का जादू में ही खोए रहते थे। कब किस राजा की ताजपोशी हुई, कब कौन सा युद्ध हुआ-इन्हीं तारीखों पर गर्मागर्म बहसें चलतीं थीं। आम समझ के हिसाब से इतिहास को तारीख़ों का पर्याय माना जाता था।
● इतिहास अलग-अलग समय पर आने वाले बदलावों के बारे में ही होता है। समय को हमेशा साल या महीनों के पैमाने पर नहीं देखा जा सकता है। कई बार ऐसी प्रक्रियाओं के लिए कोई तारीख तय करना वाकई कठिन होता है, जो एक लंबे समय तक चलती रहती हैं जैसे-भारत के लोगों ने अचानक एक दिन सुबह-सवेरे चाय या कॉफ़ी पीना शुरू नहीं कर दिया था, इनका स्वाद धीरे-धीरे भारतीयों की ज़बान पर चढ़ा था। इसी तरह ब्रिटिश शासन की स्थापना के लिए हम कोई एक तिथि नहीं बता सकते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन किस दिन शुरू हुआ या अर्थव्यवस्था या समाज में किस दिन बदलाव आए, यह बताना भी संभव नहीं है। ये सारी चीजें एक लंबे समय में घटती रहीं हैं। ऐसे में हम इनकी एक अवधि बता सकते हैं।
● इतिहास के तारीख के जुड़ाव की एक वजह यह है कि एक समय था जब युद्ध और बड़ी-बड़ी घटनाओं के ब्यौरों को ही इतिहास माना जाता था। जिसमें राजाओं के जीवन से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के ब्यौरे तिथियों के रूप में होते थे। इस तरह इतिहास में तिथियों का महत्व बना रहा।
महत्वपूर्ण तारीखों का पैमाना
● हम जो तारीखें चुनते हैं, उन तारीखों का इर्द-गिर्द अतीत की कहानी बुनते हैं, वे अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं होतीं। वे इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि हम कुछ ख़ास घटनाओं को महत्वपूर्ण मानकर चलने लगते हैं। अगर हम अध्ययन का विषय बदल दें और अन्य मुद्दों पर ध्यान देने लगें तो महत्वपूर्ण तारीखें भी बदल जाती हैं।
● इतिहास में लिखे गए प्रत्येक शासक और प्रत्येक ब्रिटिश गवर्नर का शासन काल किसी न किसी रूप में महत्वपूर्ण रहा है। इनके जीवन की महत्वपूर्ण गतिविधिययाँ इतिहास में दर्ज हो जाती हैं।
अवधि तय करने का तरीका
● हम अवधियों का निर्धारण अलग-अलग दौर की खासियतों, उसके केंद्रीय तत्वों के आधार पर करते हैं। इसीलिए ऐसे शब्द महत्वपूर्ण हो जाते हैं जिनके सहारे हम समय को बाँटते हैं। ये शब्द अतीत के बारे में हमारे विचारों को दर्शाते हैं। अवधि के द्वारा एक अवधि से दूसरी अवधि के बीच आए बदलावों के महत्व के बारे में पता चलता है।
● जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को, 'ए हिस्ट्री ऑफ द ब्रिटिश इंडिया' नामक पुस्तक में, तीन विशाल खंडों हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश में बाँटा था।
● अंग्रेजों द्वारा सुझाए गए वर्गीकरण से हटकर इतिहासकार भारतीय इतिहास को आमतौर पर प्राचीन, मध्यकालीन व आधुनिक काल में बाँटकर देखते हैं।
औपनिवेशीकरण
जब एक देश पर दूसरे देश के दबदबे से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव आते हैं तो इस प्रक्रिया को औपनिवेशीकरण कहा जाता है।
जेम्स मिल के भारत और भारतीयों के प्रति विचार
1817 में स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्री और राजनैतिक विशेषज्ञ जेम्स मिल को लगता था कि सारे एशियाई समाज सभ्यता के मामले में यूरोप से पीछे हैं। भारतीय इतिहास की उनकी समझ यह थी कि भारत में अंग्रेजों के आने से पहले यहाँ हिन्दू, मुस्लिम तानाशाहों का ही राज चलता था। यहाँ चारो ओर केवल धार्मिक बैर, जातिगत बंधनों और अंधविश्वासों का ही बोलबाला था। मिल की राय में ब्रिटिश शासन भारत को सभ्यता की राह पर ले जा सकता था। इस काम के लिए जरूरी था कि भारत में यूरोपीय शिष्टाचार, कला संस्थानों और कानूनों को लागू किया जाए। मिल ने यहां तक सुझाव दिया था कि अंग्रेजों को भारत के सारे भूभाग पर कब्जा कर लेना चाहिए ताकि भारतीय जनता को ज्ञान और सुखी जीवन प्रदान किया जा सके। इनका मानना था कि अंग्रेजों की मदद के बिना हिंदुस्तान की प्रगति संभव नहीं है।
पिछले 250 सालों के इतिहास के स्रोत
प्रशासनिक अभिलेख
● अंग्रेजी शासन द्वारा तैयार किए गए सरकारी रिकॉर्ड इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण साधन होते हैं। अंग्रेजों की मान्यता थी कि चीजों को लिखना बहुत महत्वपूर्ण होता है। उनके लिए हर निर्देश, हर योजना, नीतिगत फैसले, सहमति व जाँच को साफ-साफ लिखना जरूरी था। ऐसा करने से बाद में चीजों का अच्छी तरह से अध्ययन किया जा सकता था। और उन पर वाद-विवाद किया जा सकता है।
● अंग्रेजों को यह भी लगता था कि तमाम अहम दस्तावेजों और पत्रों को सँभालकर रखना जरूरी है। इसीलिए उन्होंने सभी शासकीय संस्थानों में अभिलेख कक्ष (रिकॉर्ड रूम) बनवा दिए थे।
● उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में प्रशासन की एक शाखा से दूसरी शाखा के पास भेजे गए पत्रों और ज्ञापनों को आज भी अभिलेखागारों में देखा जा सकता है।
सर्वेक्षण
● औपनिवेशिक शासन के दौरान सर्वेक्षण का चलन भी महत्वपूर्ण होता गया। अंग्रेजों का विश्वास था कि किसी देश पर अच्छी तरह शासन चलाने के लिए उसको सही ढंग से जानना जरूरी होता है।
● उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे देश का नक्शा तैयार करने के लिए बड़े-बड़े सर्वेक्षण किए जाने लगे। गाँवो में राजस्व सर्वेक्षण किए गए। इन सर्वेक्षणों में धरती की सतह, मिट्टी की गुणवत्ता, वहाँ मिलने वाले पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं तथा स्थानीय इतिहासों व फसलों का पता लगाया जाता था। अंग्रेजों की राय में किसी इलाके का शासन चलाने के लिए इन सारी बातों का जानना जरूरी था।
● उन्नीसवीं सदी के आखिर से हर दस साल में जनगणना के जरिए भारत के सभी प्रांतों में रहने वाले लोगों की संख्या, उनकी जाति तथा इलाके और व्यवसाय के बारे में जानकारियाँ इकट्ठा की जाती थीं। इसके अलावा वानस्पतिक सर्वेक्षण, प्राणि वैज्ञानिक सर्वेक्षण, पुरातत्वीय सर्वेक्षण, मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण, वन सर्वेक्षण आदि कई दूसरे सर्वेक्षण भी किए जाते थे।
अधिकृत रिकार्ड्स से क्या पता नहीं चलता
● रिकार्ड्स के इस विशाल भंडार से हम बहुत कुछ पता लगा सकते हैं। फिर भी, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि ये सारे सरकारी रिकार्ड्स हैं। इनमें हमें यही पता चलता है कि सरकारी अफसर क्या सोचते थे, उनकी दिलचस्पी किन चीजों में थी। इन रिकार्ड्स से हमें यह समझने में मदद नहीं मिलती कि देश के दूसरे लोग क्या महसूस करते थे और उनकी कार्रवाइयों की क्या वजह थी। इन बातों को जानने के लिए लोगों की डायरियाँ, तीर्थ यात्रियों के संस्मरण, महत्वपूर्ण लोगों की आत्मकथाएँ और स्थानीय बाज़ारों में बिकने वाली लोकप्रिय पुस्तक-पुस्तिकाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लेकिन ये सारे स्रोत उन लोगों ने रचे हैं जो पढ़ना-लिखना जानते थे। इनसे हम यह पता नहीं लगा सकते कि आदिवासी, किसान तथा खदानों में काम करने वाले मजदूर या सड़कों पर ज़िन्दगी गुजरने वाले गरीब किस तरह के अनुभवों से गुजर रहे थे।
Sudhanshu Mishra
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