तालिबान : Taalibaan

■ तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का एक संगठन है। इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं। घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है। पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना। ■ तालिबान जिसे तालेबान के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आंदोलन है जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पश्तून में तालिबान का मतलब 'छात्र' होता है, एक तरह से यह उनकी शुरुआत मदरसों से जाहिर करता है। उत्तरी पाकिस्तान में सुन्नी इस्लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान के जन्म हुआ। ■ शीतयुद्ध के दौर में तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के स्थानीय मुजाहिदीनों (शाब्दिक अर्थ - विधर्मियों से लड़ने वाले योद्धा) को हथियार और ट्रेनिंग देकर जंग के लिए उकसाया था। नतीजन, सोवियत संघ तो हार मानकर चला गया, लेकिन अफगानिस्तान में एक कट्टरपंथी आतंकी संगठन का जन्म हो ...

NCERT History Class-8 Chapter-3 ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना। Summary

कंपनी दीवान के रूप में

● 12 अगस्त 1765 को मुग़ल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का दीवान तैनात किया। दीवान के तौर पर कंपनी अपने नियंत्रण वाले भूभाग के आर्थिक मामलों की मुख्य शासक बन गयी थी। अब उसे अपनी जमीन का शासन चलाने और आमदनी को व्यवस्थित करने का रास्ता ढूँढना था। जिससे कंपनी के बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिये काफी आमदनी जुटाई जा सके। व्यापारिक कंपनी के नाते उसे यह ख्याल भी रखना था कि वह अपनी जरूरत की चीजें खरीदती बेचती रहे।
● समय के साथ कंपनी को भी यह समझ में आने लगा की उसे सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। बाहरी ताकत होने की वजह से उसे उन लोगों को भी शांत रखना था, जो गाँव-देहात में पहले शासन चला चुके थे और जिनके पास अभी भी काफी ताकत और सम्मान था। ऐसे लोग स्थानीय सत्ता में रह चुके थे। उन्हें नियंत्रित करना जरूरी था क्योंकि उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता था।

कंपनी की आमदनी

● कंपनी दीवान तो बन गई थी लेकिन अभी भी खुद को एक व्यापारी ही मानती थी। कंपनी भारी-भरकम लगान तो चाहती थी लेकिन उसके आकलन और वसूली की कोई नियमित व्यवस्था करने में हिचकिचा रही थी। उसकी कोशिश यही थी कि वह ज्यादा से ज्यादा राजस्व हासिल करे और कम से कम कीमत पर बढ़िया सूती और रेशमी कपड़ा खरीदे। इसी कारण, पांच साल के भीतर बंगाल में कंपनी द्वारा खरीदी जाने वाली चीजों का कुल मूल्य दोगुना हो चुका था। 1865 से पहले कंपनी ब्रिटेन से सोने चाँदी का आयात करती थी। और इन चीजों के बदले सामान खरीदती थी। अब बंगाल में इकट्ठा होने वाले पैसे से ही निर्यात के लिए चीजें खरीदी जा सकती थीं।
● जल्दी ही यह जाहिर हो गया कि बंगाल की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में फँसती जा रही है। कारीगर गाँव छोड़कर भाग रहे थे क्योंकि उन्हें बहुत कम कीमत पर अपनी चीजें कंपनी को जबरन बेचनी पड़ती थीं। किसान अपना लगान नहीं चुका पा रहे थे। कारीगरों का उत्पादन गिर रहा था और खेती चौपट होने की दिशा में बढ़ रही थी। 1770 में पड़े अकाल ने बंगाल में एक करोड़ लोगों को मौत की नींद सुला दिया। इस अकाल में लगभग एक तिहाई आबादी समाप्त हो गई।

खेती में सुधार की जरूरत

● बंगाल में अर्थव्यवस्था संकट में थी। कंपनी के ज्यादातर अफसरों को यह लगने लगा था कि जमीन में निवेश करना और खेती में सुधार लाना जरूरी है। यह काम किस तरह किया जा सकता था? इस पर दशकों तक बहस चली।

स्थाई बंदोबस्त व्यवस्था

कंपनी ने 1773 में स्थाई बंदोबस्त लागू किया। इस बंदोबस्त की शर्तों के हिसाब से राजाओं और तालुकेदारों को जमींदारों के रूप में मान्यता दी गई थी। उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने के जिम्मा सौंपा गया। उनकी ओर से चुकाई जाने वाली राशि स्थाई रूप से तय कर दी गई थी। इसका मतलब यह था कि भविष्य में कभी भी उसमें इजाफा नहीं किया जाना था। अंग्रेजों को लगता था कि इससे उन्हें नियमित रूप से राजस्व मिलता रहेगा और जमींदारों को जमीन में सुधार के लिए खर्च करने का प्रोत्साहन मिलेगा। उन्हें लगता था कि राज्य की ओर से राजस्व की मांग न बढ़ने पर जमींदार बढ़ते उत्पादन से फायदे में रहेंगे।

स्थाई बंदोबस्त की समस्याएं

● कंपनी के अनुमान के विपरीत स्थाई बंदोबस्त ने भी समस्या पैदा कर दी। कंपनी के अफसरों ने पाया कि अभी भी जमींदार जमीन में सुधार के लिए खर्च नहीं कर रहे थे। असल में, कंपनी ने जो राजस्व तय किया था वह इतना ज्यादा था कि उसको चुकाने में जमींदारों को भारी परेशानी हो रही थी। जो जमींदार राजस्व चुकाने में विफल हो जाता था उसकी जमींदारी छीन ली जाती थी। बहुत सारी जमींदारियों को कंपनी बाकायदा नीलाम कर चुकी थी।
● उन्नीसवीं सदी के पहले दशक तक हालात बदल चुके थे। बाजार में कीमतें बढीं और धीरे-धीरे खेती का विस्तार होने लगा इससे जमींदारों की आमदनी में तो सुधार आया लेकिन कंपनी को कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि कंपनी तो हमेशा के लिए राजस्व तय कर चुकी थी। अब वह राजस्व वृद्धि नहीं कर सकती थी।
● लेकिन जमींदारों को अभी भी जमीन की बेहतरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनमें से कुछ तो बंदोबस्त के शुरुआती सालों में ही अपनी जमीन गंवा चुके थे। जो बचे रह गए थे अब उन्हें बिना परेशानी और निवेश का खतरा उठाए आमदनी की उम्मीद दिखाई दे रही थी। जब तक जमींदार किसानों को जमीन देकर उनसे लगान वसूल सकते थे उन्हें जमीन में सुधार की परवाह नहीं थी।
● दूसरी तरफ, गाँवो में किसानों को यह व्यवस्था दमनकारी दिखाई दी। किसान को जो लगान चुकाना था वह बहुत ज्यादा था और जमीन पर उसका अधिकार सुरक्षित नहीं था। लगान चुकाने के लिए अक्सर महाजन से कर्ज लेना पड़ता था। अगर वह लगान नहीं चुका पाता था तो उसे पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।

महालवारी बंदोबस्त व्यवस्था (एक नई व्यवस्था)

● उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही कंपनी के बहुत सारे अधिकारियों को इस बात का यकीन हो चुका था कि राजस्व बंदोबस्त में दोबारा बदलाव लाना जरूरी है।
● बंगाल प्रेजीडेंसी के उत्तर-पश्चिम प्रांतों (इस इलाके का ज्यादातर हिस्सा अब उत्तर प्रदेश में है) के लिए होल्ट मैकेंजी नामक अंग्रेज ने एक नई व्यवस्था तैयार की जिसे 1822 में लागू किया गया। मैकेंजी को विश्वास था कि उत्तर भारतीय समाज में गाँव एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है और उसको बचाए रखना चाहिए। उसके आदेश पर कलेक्टरों ने गांव-गांव का दौरा किया, जमीन की जांच की, खेतों को नापा और विभिन्न समूहों के रीति-रिवाजों को दर्ज किया। गांव के एक-एक खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर हर गांव या ग्राम समूह (महाल) से वसूल होने वाले राजस्व का हिसाब लगाया जाता था। इस राजस्व को स्थाई रूप से तय नहीं किया गया बल्कि उसमें समय समय पर संशोधनों की गुंजाइश रखी गयी। राजस्व इकट्ठा करने और उसे कंपनी को अदा करने का जिम्मा जमींदार की बजाय गांव के मुखिया को सौंप दिया गया। इस व्यवस्था को महालवारी बंदोबस्त का नाम दिया गया।

रैयतवारी व्यवस्था (मुनरो व्यवस्था)

● ब्रिटिश नियंत्रण वाले दक्षिण भारतीय इलाकों  में भी स्थाई बंदोबस्त की जगह नई व्यवस्था अपनाने का प्रयास किया जाने लगा। वहां जो नई व्यवस्था विकसित हुई उसे रैयतवार या रैयतवारी का नाम दिया गया। कैप्टन एलेक्जेंडर रीड ने टीपू सुल्तान के साथ चले युद्धों के बाद कंपनियों द्वारा कब्जे में लिए गए कुछ इलाकों में इस व्यवस्था को विकसित किया और धीरे-धीरे पूरे दक्षिणी भारत पर यही व्यवस्था लागू कर दी गई।
● रीड और मुनरो को लगता था कि दक्षिण में परंपरागत जमींदार नहीं थे इसलिए उनका तर्क यह था कि उन्हें सीधे किसानों (रैयतों) से ही बंदोबस्त करना चाहिए जो पीढ़ियों से जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। राजस्व आकलन से पहले उनके खेतों के सावधानीपूर्वक और अलग से सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। मुनरो का मानना था कि अंग्रेजों को पिता की भांति किसानों की रक्षा करनी चाहिए।

नई व्यवस्थाओं में कमी

नई व्यवस्थाएं लागू होने के बाद महज कुछ साल के भीतर उसमें समस्याएं दिखाई देने लगीं। जमीन से होने वाली आमदनी बढ़ाने के चक्कर में राजस्व अधिकारियों ने बहुत ज्यादा राजस्व तय कर दिया था। किसान राजस्व चुका नहीं पा रहे थे। रैयत गाँवो से भाग रहे थे। बहुत सारे क्षेत्रों में गाँव वीरान हो गए थे। आशावादी अफसरों को उम्मीद थी कि नई व्यवस्था किसानों को सम्पन्न उद्यमशील किसान बना देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

यूरोप के लिए फसलें

अंग्रेजों ने यह भी महसूस किया कि ग्रामीण इलाके न केवल राजस्व प्रदान कर सकते हैं बल्कि वहां यूरोप की जरूरतों के हिसाब से सही फसलें भी पैदा की जा सकती हैं। अठारहवीं सदी के आखिर तक कंपनी ने अफीम और नील की खेती पर पूरा जोर लगा दिया था। इसके बाद लगभग 150 साल तक अंग्रेज देश के विभिन्न भागों में किसी न किसी फसल के लिए किसानों को मजबूर करते रहे: बंगाल में पटसन, असम में चाय, संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में गन्ना, पंजाब में गेहूँ, महाराष्ट्र व पंजाब में कपास, मद्रास में चावल।

भारतीय नील की मांग क्यों थी?

● नील का पौधा मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय इलाकों में ही उगता है। तेरहवीं सदी तक इटली, फ्रांस और ब्रिटेन के कपड़ा उत्पादक कपड़े की रँगाई के लिए भारतीय नील का इस्तेमाल कर रहे थे।
● उस समय भारतीय नील की बहुत थोड़ी मात्रा ही यूरोपीय बाज़ारों में पहुँचती थी। उसकी कीमत भी बहुत कम रहती थी। इसीलिए यूरोपीय कपड़ा उत्पादकों को बैंगनी और नीले रंग बनाने के लिए वोड नामक एक और पौधे पर निर्भर रहना पड़ता था। वोड पौधा शीतोष्ण क्षेत्र में उगता था इसलिए यूरोप में आसानी से मिल जाता था। उत्तरी इटली, दक्षिणी फ्रांस व जर्मनी और ब्रिटेन के कई हिस्सों में यह पौधा उगता था। नील के साथ प्रतिस्पर्धा से परेशान यूरोप के वोड उत्पादकों ने अपनी सरकारों पर दबाव डाला कि वे नील के आयात पर पाबंदी लगा दें।
● परंतु कपड़ा रंगने वाले तो नील को ही पसंद करते थे। नील से बहुत चमकदार नीला रंग मिलता था जबकि वोड से मिलने वाला रंग बेजान और फीका होता था। सत्रहवीं सदी तक आते-आते यूरोपीय कपड़ा उत्पादकों ने नील के आयात पर लगी पाबंदी में ढील देने के लिए अपनी सरकारों को राजी कर लिया। कैरिबियाई द्वीप समूह स्थित सेंट डामिंग्यू में फ्रांसीसी, ब्राजील में पुर्तगाली, जमैका में ब्रिटिश और वेनेजुएला में स्पैनिश लोग नील की खेती करने लगे। उत्तरी अमेरिका के भी बहुत सारे भागों में नील के बागान सामने आ गए थे।
● अठारहवीं शताब्दी के आखिर तक भारतीय नील की मांग और बढ़ गयी। ब्रिटेन में औद्योगीकरण का युग शुरू हो चुका था और उसके कपास उत्पादन में भारी इजाफा हुआ। अब कपड़ों की रंगाई की मांग बढ़ी उसी दौरान वेस्टइंडीज और अमेरिका से मिलने वाली आपूर्ति अनेक कारणों से बंद हो गई। 1783 से 1789 के बीच दुनिया का नील उत्पादन आधा रह गया था। ब्रिटेन के रंगरेज अब नील की आपूर्ति के लिए बेचैनी से किसी और स्रोत को तलाश कर रहे थे।

भारत में नील के लिए ब्रिटेन की बढ़ती दिलचस्पी

● यूरोप में नील की बढ़ती मांग को देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत में नील की खेती बढ़ाने के रास्ते ढूंढने लगी।
● अठारहवीं सदी के आखिरी दशकों से ही बंगाल में नील की खेती तेजी से फैलने लगी थी। बंगाल में पैदा होने वाला नील दुनिया के बाजारों पर छा गया था। 1788 में ब्रिटेन द्वारा आयात किए गए नील में भारतीय नील का हिस्सा केवल 30 प्रतिशत था। 1810 में ब्रिटेन द्वारा आयात किए गए नील में भारतीय नील का हिस्सा 95 प्रतिशत हो चुका था।
● जैसे-जैसे नील का व्यापार फैला, कंपनी के अफसर और व्यावसायिक एजेंट नील के उत्पादन में पैसा लगाने लगे। समय बीतने के साथ कंपनी के बहुत सारे अधिकारियों ने नील के अपने कारोबार पर ध्यान देने के लिए अपनी नौकरियां छोड़ दी। भारी मुनाफे की उम्मीद में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड के बहुत सारे लोग भारत आए और उन्होंने नील के बागान लगा लिए। जिनके पास पैदावार के लिए पैसा नहीं था उन्हें कंपनी और नए-नए बैंक कर्ज देने को तैयार थे।

नील की खेती कैसे होती थी?

नील की खेती के दो मुख्य तरीके थे - निज और रैयत।

1- निज खेती

निज खेती की व्यवस्था में बागान मालिक खुद अपनी जमीन में नील का उत्पादन नहीं करते थे। या तो वह जमीन खरीद लेते थे या फिर दूसरे जमींदारों से जमीन भाड़े पर ले लेते थे और मजदूरों को काम पर लगाकर नील की खेती करवाते थे।

निज खेती की समस्याएं

● बागान मालिकों को निज खेती का क्षेत्रफल फैलाने में मुश्किल आ रही थी। नील की खेती केवल उपजाऊ जमीन पर ही कि जा सकती थी। ऐसी जमीनों पर आबादी पहले ही बहुत ज्यादा थी। यहां- वहां छोटे-मोटे खेत ही उनके हाथ लग पाते थे। नील की खेती करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े भूखंडों की जरूरत थी। उन्होंने नील की फैक्ट्री  के इर्द-गिर्द पट्टे पर जमीन लेने के प्रयास किए और वहां के किसानों को हटवा दिया। इससे टकराव और तनाव पैदा हो जाता था।
● मजदूरों का इंतजाम करना भी आसान नहीं था। बड़े बागान के लिए बहुत सारे मजदूरों की जरूरत होती थी। मजदूरों की जरूरत भी सबसे ज्यादा उसी समय होती थी जब किसान धान की खेती में व्यस्त रहते थे।
● बड़े पैमाने पर निज खेती के लिए सारे हल-बैलों की भी जरूरत थी। एक बीघा नील की खेती के लिए दो हल चाहिए होते थे। इसका मतलब यह था कि अगर किसी बागान मालिक के पास एक हजार बीघा जमीन है तो उसे दो हजार हलों की जरूरत पड़ती। हल को खरीदना और उनका रखरखाव एक बड़ी समस्या थी। किसानों से भी हल नहीं मिल सकते थे। उन्हें अपने लिए इन चीजों की जरूरत होती थी। जिस समय नील उत्पादकों को जरूरत होती थी उसी समय किसानों के हल-बैल चावल के खेतों में व्यस्त रहते थे।
● उन्नीसवीं सदी के आखिर तक बागान मालिक निज का क्षेत्रफल फैलाने में हिचकिचाते थे। इस व्यवस्था के तहत नील की पैदावार वाली 25 प्रतिशत से भी कम जमीन आती थी। बाकी जमीन रैयती व्यवस्था के अंतर्गत थी।

2- रैयती जमीन पर नील की खेती

● रैयती व्यवस्था के तहत बागान मालिक रैयतों के साथ एक अनुबंध (सट्टा) करते थे। कई बार वे गाँव के मुखियाओं को भी रैयतों की तरफ से समझौता करने के लिए बाध्य कर देते थे। जो अनुबंध पर दस्तखत कर देते थे उन्हें नील उगाने के लिए कम ब्याजदर पर बागान मालिकों से नकद कर्ज मिल जाता था। कर्ज लेने वाले रैयत को अपनी कम से कम 25 प्रतिशत जमीन पर नील की खेती करनी होती थी। बागान मालिक बीज और उपकरण मुहैया कराते थे जबकि मिट्टी को तैयार करने, बीज बोने और फसल की देखभाल करने का जिम्मा काश्तकारों के ऊपर रहता था।
● जब कटाई के बाद फसल बागान मालिक को सौंप दी जाती थी तो रैयत को नया कर्ज मिल जाता था और वही चक्र दोबारा शुरू हो जाता था। जो किसान पहले इन कर्जों से बहुत आकर्षित थे उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि यह व्यवस्था कितनी कठोर है। उन्हें नील की जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी और कर्जों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता था।
● समस्याएं और भी थीं। बागान मालिक चाहते थे कि किसान अपने सबसे बढ़िया खेतों में ही नील की खेती करें। लेकिन नील के साथ परेशानी यह थी कि उसकी जड़े बहुत गहरी होती थीं। और वह मिट्टी की सारी ताकत खींच लेती थी। नील की कटाई के बाद वहां धान की खेती नहीं कि जा सकती थी।

"नील विद्रोह" और उसके बाद

● मार्च 1859 में बंगाल के हजारों रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। जैसे-जैसे विद्रोह फैला, रैयतों ने बागान मालिकों को लगान चुकाने से भी इनकार कर दिया। वे तलवार, भाले और तीर-कमान लेकर नील की फैक्ट्रियों पर हमला करने लगे। औरतें अपने बर्तन लेकर लड़ाई में कूद पड़ीं। बागान मालिकों के लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। बागान मालिकों की तरफ से लगान वसूली के लिए आने वाले एजेंटों की पिटाई की गई। रैयतों ने कसम खा ली कि न तो नील की खेती के लिए कर्ज लेंगे और न ही बागान मालिकों के लाठीधारी गुंडों से डरेंगे।
● 1859 में नील रैयतों को लगा कि बागान मालिकों के खिलाफ बगावत में उन्हें स्थानीय जमींदारों और मुखियाओं का भी समर्थन मिल सकता है। बहुत सारे गाँवो में जिन मुखियाओं से नील किसानों को इकट्ठा किया और लाठीधारी गुंडों के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ी। कई स्थानों पर रैयतों को बगावत का लिए उकसाते हुए जमींदार गांव-गांव घूमने लगे। जमींदार इस बात से परेशान थे कि बागान मालिकों की ताकत बढ़ती जा रही थी और बागान मालिक जबरन लंबे समय के लिए उनसे जमीन ले लेते थे। 
● नील के किसानों को ये भी लग रहा था कि अंग्रेजी सरकार भी संघर्ष में उनका साथ देगी। 1857 की बगावत का बाद ब्रिटिश सरकार एक और व्यापक विद्रोह के खतरे से डरी हुई थी। जब नील को खेती वाले जिलों में एक और बगावत की खबर फैली तो लेफ्टिनेंट गवर्नर ने 1859 की सर्दियों में इलाके का दौरा किया। रैयतों को लगा कि सरकार उनकी दुर्दशा से परेशान है। बरसात में मजिस्ट्रेट ऐशले ईडन ने एक नोटिस जारी किया जिसमें कहा गया था कि रैयतों को नील के अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। इस नोटिस के आधार पर लोगों में यह खबर फैल गई कि रानी विक्टोरिया ने नील की खेती न करने का हुक्म दिया है। ईडन किसानों को शांत करने और विस्फोटक स्थितियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे। उसकी कार्रवाई को किसानों ने अपने विद्रोह का समर्थन मान लिया।
● जैसे-जैसे विद्रोह फैला, कलकत्ता के पढ़े-लिखे लोग भी नील जिलों की ओर चल पड़े। उन्होंने रैयतों की दुर्दशा, बागान मालिकों की जोर-जबरदस्ती और अत्याचारी नील व्यवस्था के बारे में लिखा।
● इस बगावत से परेशान सरकार को बागान मालिकों की रक्षा के लिए सेना बुलानी पड़ी। नील उत्पादन व्यवस्था की जांच करने के लिए एक नील आयोग भी बना दिया गया। इस आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया, जोर-जबरदस्ती के लिए उनकी आलोचना की। आयोग ने कहा कि नील की खेती रैयतों के लिए फायदे का सौदा नहीं है। आयोग ने रैयतों से कहा कि वे मौजूदा अनुबंधों को पूरा करें लेकिन आगे से वे चाहें तो नील की खेती बंद कर सकते हैं।
● इस बगावत का बाद बागानों में नील का उत्पादन धराशायी हो गया। इसके बाद बागान मालिक बिहार पर ध्यान देने लगे। उन्नीसवीं सदी के आखिर में कृत्रिम रंगों का निर्माण होने लगा था। इससे उनका व्यवसाय भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। फिर भी, वे उत्पादन फैलाने में सफल रहे। जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो बिहार के एक किसान ने उन्हें चंपारण आकर नील किसानों की दुर्दशा को देखने का न्यौता दिया। 1917 में महात्मा गांधी का यह दौरा नील बागान मालिकों के खिलाफ चंपारण आंदोलन की शुरुआत थी।

Sudhanshu Mishra


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