तालिबान : Taalibaan

■ तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का एक संगठन है। इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं। घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है। पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना। ■ तालिबान जिसे तालेबान के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आंदोलन है जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पश्तून में तालिबान का मतलब 'छात्र' होता है, एक तरह से यह उनकी शुरुआत मदरसों से जाहिर करता है। उत्तरी पाकिस्तान में सुन्नी इस्लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान के जन्म हुआ। ■ शीतयुद्ध के दौर में तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के स्थानीय मुजाहिदीनों (शाब्दिक अर्थ - विधर्मियों से लड़ने वाले योद्धा) को हथियार और ट्रेनिंग देकर जंग के लिए उकसाया था। नतीजन, सोवियत संघ तो हार मानकर चला गया, लेकिन अफगानिस्तान में एक कट्टरपंथी आतंकी संगठन का जन्म हो ...

NCERT History Class-8 Chapter-4 आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना। Summary

■ 1885 में बिरसा नाम के एक आदमी को झारखंड में छोटा नागपुर के जंगलों और गांवों में घूमते देखा गया। लोग कहते थे कि उसके पास चमत्कारी शक्तियाँ हैं - वह सारी बीमारियाँ दूर कर सकता था और अनाज की छोटी ढेरी को कई गुना बढ़ा देता था। बिरसा ने खुद यह ऐलान कर दिया था कि उसे भगवान ने लोगों की रक्षा और उनको दीकुओं (बाहरी लोगों) की गुलामी से आजाद करने के लिए भेजा है। कुछ समय के भीतर ही हजारों लोग बिरसा के पीछे चलने लगे। वे उसे भगवान मानते थे। उन्हें यकीन था कि वह उनकी समस्याएं दूर करने आया है।
■ बिरसा का जन्म एक मुंडा परिवार में हुआ था। मुंडा एक जनजाति समूह है जो छोटा नागपुर में रहती है। बिरसा के समर्थकों में इलाके के दूसरे आदिवासी संथाल और उराँव भी शामिल थे। ये सभी अपने आस-पास आ रहे बदलावों और अंग्रेज शासन के कारण पैदा हो रही समस्याओं से बेचैन थे। उनकी परिचित जीवन पध्यति नष्ट होती दिखाई दे रही थी, आजीविका खतरे में थी और धर्म छिन्न-भिन्न हो रहा था।

जनजातीय समूहों के जीवन-यापन के तरीके

उन्नीसवीं सदी तक देश के विभिन्न भागों में आदिवासी तरह-तरह की गतिविधियों में सक्रिय थे। जिनके द्वारा वे अपना जीवन-यापन करते थे।

झूम खेती के कृषक के रूप में

■ कुछ समुदाय झूम खेती करते थे। झूम खेती घुमंतू खेती को कहा जाता है। इस तरह की खेती अधिकांशतः जंगलों में छोटे-छोटे भूखंडों पर की जाती थी। ये लोग जमीन तक धूप लाने के लिए पेड़ों के ऊपरी हिस्सों को काट देते थे और जमीन पर उगी घास-फूस जलाकर साफ कर देते थे। इसके बाद वे घास-फूस के जलने पर पैदा हुई घास को खाली जमीन पर छिड़क देते थे। इस राख में पोटाश होती थी जिससे मिट्टी उपजाऊ हो जाती थी। वे कुल्हाडों से पेड़ों को काटते थे और कुदालों से जमीन खुरच देते थे। वे खेतों को जोतने और बीज रोपने की बजाय उन्हें बस खेत में बिखेर देते थे। जब एक बार फसल तैयार हो जाती थी तो उसे काटकर वे दूसरी जगह के लिए चल पड़ते थे। जहाँ से उन्होंने अभी फसल काटी थी वह जगह कई साल तक परती पड़ी रहती थी। 
■ घुमंतू किसान मुख्य रूप से पूर्वोत्तर और मध्य भारत के पर्वतीय व जंगली पट्टियों में ही रहते थे। इन आदिवासी समुदायों की ज़िंदगी जंगलों में बेरोकटोक आवाजाही और फसल उगाने के लिए जमीन और जंगलों के इस्तेमाल पर आधारित थी। वे केवल इसी तरीके से घुमंतू खेती कर सकते थे।

शिकारी और संग्राहक के रूप में 

बहुत सारे इलाकों में आदिवासी समूह पशुओं का शिकार करके और वन्य उत्पादों को इकट्ठा करके अपना काम चलाते थे। वे जंगलों को अपनी जिंदगी के लिए बहुत आवश्यक मानते थे। उड़ीसा के जंगलों में रहने वाला खोंड समुदाय इसी तरह का एक समुदाय था। इस समुदाय के लोग टोलियाँ बनाकर शिकार पर निकलते थे और जो हाथ लगता था उसे आपस में बाँट लेते थे। वे जंगलों से मिले फल और जड़ें खाते थे। खाना पकाने के लिए वे साल और महुआ के बीजों का इस्तेमाल करते थे। इलाज के लिए वे बहुत सारी जंगली जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते थे और जंगलों से इकट्ठा हुई चीजों को स्थानीय बाज़ारों में बेच देते थे। जब भी स्थानीय बुनकरों और चमड़ा कारीगरों को कपड़े व चमड़े की रँगाई के लिए कुसुम और पलाश के फूलों की जरूरत होती थी तो वे खोंड समुदाय के लोगों से कहते थे।

पशुपालक के रूप में

बहुत सारे आदिवासी समूह जानवर पालकर अपनी ज़िंदगी चलाते थे। वे चरवाहे थे, जो मौसम के हिसाब से मवेशियों या भेड़ों के झुंड लेकर यहाँ से वहाँ जाते रहते थे। जब एक जगह घास खत्म हो जाती थी तो वे दूसरे इलाकों में चले जाते थे। पंजाब के पहाड़ों में रहने वाले वन गुज्जर और आंध्र प्रदेश के लबाड़िया आदि समुदाय गाय-भैंस के झुंड पालते थे।

स्थायी कृषक के रूप में 

■ उन्नीसवीं सदी से पहले ही बहुत सारे जनजातीय कबीले एक जगह टिककर खेती करने लगे थे। वे बार-बार जगह बदलने के बजाय साल-दर-साल एक ही जगह खेती करते थे। वे हलों का इस्तेमाल करने लगे थे और धीरे-धीरे उन्हें जमीन पर अधिकार मिलते जा रहे थे। बहुत सारे समुदायों में छोटा नागपुर के मुंडाओं की तरह जमीन पूरे कबीले की संपत्ति होती थी। कुल के सभी सदस्यों को उन मूल निवासियों का वंशज माना जाता था जिन्होंने सबसे पहले आकर जमीन को साफ किया था। लिहाजा जमीन पर सभी का बराबर हक़ होता था। फिर भी, अक्सर ऐसा होता था कि कुल के कुछ लोग अन्य से ज्यादा ताकत जुटा लेते थे। जो ताकतवर होते थे, वे खुद खेती करने के बजाय अक्सर अपनी जमीन बँटाई पर दे देते थे।
■ ब्रिटिश अफसरों को गोंड और संथाल जैसे एक जगह ठहरकर रहने वाले आदिवासी समूह शिकारी-संग्राहक या घुमंतू खेती करने वालों के मुकाबले ज्यादा सभ्य दिखाई देते थे। जंगलों में रहने वालों को जंगली और बर्बर माना जाता था। अंग्रेजों को लगता था कि उन्हें स्थायी रूप से एक जगह बसाना और सभ्य बनाना जरूरी है।

औपनिवेशिक शासन से आदिवासियों के जीवन पर पड़े प्रभाव

ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासी समूहों का जीवन बदल गया। ये प्रभाव निम्नवत हैं।

मुखियाओं पर प्रभाव

अंग्रेजों के आने से पहले बहुत सारे इलाकों में आदिवासी मुखियाओं का महत्वपूर्ण स्थान होता था। कई जगह उनकी अपनी पुलिस होती थी और वे जमीन एवं वन प्रबंधन के स्थानीय नियम खुद बनाते थे। ब्रिटिश शासन के तहत आदिवासी मुखियाओं के कामकाज और अधिकार काफी बदल गए थे। उन्हें कई-कई गांवों पर जमीन का मालिकाना हक तो मिला रहा लेकिन उनकी शासकीय शक्तियाँ छिन गईं और उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बनाए गए नियमों को मानने के लिए बाध्य कर दिया गया। उन्हें अंग्रेजों को नजराना देना पड़ता था और अंग्रेजों के प्रतिनिधि की हैसियत से अपने समूहों को अनुशासन में रखना होता था। पहले उनके पास जो ताकत थी अब वह नहीं रही। वे परंपरागत कामों को करने से लाचार हो गए

घुमंतू काश्तकारों पर प्रभाव

■ ऐसे समूहों से अंग्रजों को काफी परेशानी थी, जो यहाँ-वहाँ भटकते रहते थे और एक जगह ठहरकर नहीं रहते थे। वे चाहते थे कि आदिवासियों के समूह एक जगह स्थायी रूप से रहें और खेती करें। स्थायी रूप से एक जगह रहने वाले किसानों को नियंत्रित करना आसान था। अंग्रेज अपने शासन के लिए आमदनी का नियामित स्रोत भी चाहते थे। फलस्वरूप उन्होंने जमीन के बारे में कुछ नियम लागू कर दिए।
■ झूम काश्तकारों को स्थायी रूप से बसाने की अंग्रेजों की कोशिश बहुत कामयाब नहीं रही। जहाँ पानी कम हो और मिट्टी सूखी हो, वहाँ हलों से खेती करना आसान नहीं होता और हलों से खेती करने वाले झूम काश्तकारों को अक्सर नुकसान ही हुआ क्योंकि उनके खेत अच्छी उपज नहीं दे पाते थे, इसलिए पूर्वोत्तर राज्यों में झूम काश्तकार इस बात पर अड़े रहे कि उन्हें परंपरागत ढंग से ही जीने दिया जाए। व्यापक विरोध के फलस्वरूप अंग्रेजों को आखिरकार उनकी बात माननी पड़ी और ऐसे कबीलों को जंगल के कुछ हिस्सों में घुमंतू खेती की छूट दे दी गई।

वन कानूनों पर प्रभाव

■ जैसा कि हमने देखा है कि आदिवासी समूहों का जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ था। अतः वन कानूनों में आए बदलावों से आदिवासियों के जीवन पर भी भारी असर पड़ा। अंग्रेजों ने सारे जंगलों पर। अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था और जंगलों को राज्यों की संपत्ति घोषित कर दिया था। कुछ जंगलों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया। ये ऐसे जंगल थे जहाँ अंग्रेजों की जरूरतों के लिए इमारती लकड़ी पैदा होती थी। इन जंगलों में लोगों को स्वतंत्र रूप से घूमने, झूम खेती करने, फल इकट्ठा करने या पशुओं का शिकार करने की इजाजत नहीं थी। ऐसी सूरत में झूम काश्तकारों को काम और रोजगार की तलाश में मजबूरन दूसरे इलाकों में जाना पड़ा।
■ जब अंग्रेजों को रेलवे स्लीपर्स के लिए पेड़ काटने और लकड़ी एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने तय किया कि झूम काश्तकारों को जंगल में जमीन के छोटे टुकड़े दिए जाएंगे और उन्हें वहां खेती करने की भी छूट होगी बशर्ते गांवों में रहने वालों को वन विभाग के लिए मजदूरी करनी होगी। इस तरह, बहुत सारे इलाकों में वन विभाग ने सस्ते श्रम की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वहां गांव बसा दिए।
■ बहुत सारे आदिवासी समूहों ने औपनिवेशिक वन कानूनों का विरोध किया, उन्होंने नए नियमों का पालन करने से इनकार कर दिया और उन्हीं तौर-तरीकों से चलते रहे जिन्हें सरकार गैर-कानूनी घोषित कर चुकी थी। आदिवासियों ने कई बार खुलेआम बगावत भी कर दी। 1906 में सोंग्रम संगमा द्वारा असम में और 1930 के दशक में मध्य प्रान्त में हुआ वन सत्याग्रह इसी तरह के विद्रोह थे।

व्यापार पर प्रभाव

■ उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान जनजातीय समूहों ने पाया कि व्यापारी और महाजन जंगलों में जल्दी-जल्दी आने लगे हैं। वे वन उपज खरीदने, नकद कर्ज देने और आदिवासियों को मजदूरी पर रखने के लिए आ रहे थे। इन सारे बदलावों से क्या असर पड़ने वाले हैं यह समझने में आदिवासियों को कुछ समय लगा।
■ वर्तमान झारखंड में स्थित हजारी बाग के आस-पास रहने वाले संथाल रेशम के कीड़े पालते थे। रेशम के व्यापारी अपने एजेंटों को भेजकर आदिवासियों को कर्जे देते थे और उनके क्रमिकोषों को इकट्ठा कर लेते थे। एक हजार क्रमिकोषों के लिए 3-4 रुपये मिलते थे। इसके बाद इन क्रमिकोषों को बर्दवान या गया भेज दिया जाता था जहां उन्हें पांच गुना कीमत पर बेच दिया जाता था। निर्यातकों और रेशम उत्पादकों के बीच कड़ी का काम करने वाले बिचौलियों को जमकर मुनाफा होता था। रेशम उत्पादकों को बहुत मामूली फायदा मिलता था। स्वाभाविक है कि बहुत सारे आदिवासी समुदाय बाजार और व्यापारियों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगे थे।

रोजगार पर प्रभाव

काम की तलाश में घर से दूर जाने वाले आदिवासियों की दशा तो और भी खराब थी। उन्नीसवीं सदी के आखिर से ही चाय बागान फैलने लगे थे। खनन उद्योग भी एक महत्वपूर्ण उद्योग बन गया था। असम के चाय बागानों और झारखंड की कोयला खदानों में काम करने के लिए आदिवासियों  को बड़ी संख्या में भर्ती किया गया। इन लोगों को ठेकेदारों के द्वारा भर्ती किया जाता था। ये ठेकेदार न केवल उन्हें बहुत कम वेतन देते थे बल्कि उन्हें वापस घर भी नहीं लौटने नहीं देते थे।

आदिवासी आंदोलन व विद्रोह

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के दौरान देश के विभिन्न भागों में जनजातीय समूहों ने बदलते कानूनों, अपने व्यापार पर लगी पाबंदियों, नए करों और व्यापारियों व महाजनों द्वारा किए जा रहे शोषण के खिलाफ कई बार बगावत की। 1831-32 में कोल आदिवासियों ने और 1855 में संथालों ने बगावत कर दी थी। मध्य भारत मे बस्तर विद्रोह 1910 में हुआ और 1940 में महाराष्ट्र में वर्ली विद्रोह हुआ बिरसा जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वह भी इसी तरह का विद्रोह था।

बिरसा मुंडा


■ बिरसा का जन्म 1870 के दशक के मध्य में हुआ। उनके पिता गरीब थे। बिरसा का बचपन भेड़-बकरियां चराते, बांसुरी बजाते और स्थानीय अखाड़ों में नाचते-गाते बीता था। उनकी परवरिश मुख्य रूप से बोहोण्डा के आस-पास जंगलों में हुई। लड़कपन में ही बिरसा ने अतीत में हुए मुंडा विद्रोहों की कहानियां सुन ली थीं। उन्होंने कई बार समुदाय के मुखियाओं को विद्रोह का आह्वान करते देखा था। बिरसा के समुदाय के लोग ऐसे स्वर्ण युग की बात करते थे, जब मुंडा लोग दीकुओं के उत्पीड़न से पूरी तरह मुक्त थे। सरदारों का कहना था कि एक बार फिर उनके समुदाय के परंपरागत अधिकार बहाल हो जाएंगे। वे खुद को इलाके के मूल निवासियों का वंशज मानते थे और अपनी जमीन की लड़ाई लड़ रहे थे। वे लोगों को याद दिलाते थे कि उन्हें अपना साम्राज्य वापस पाना है। 
■ बिरसा स्थानीय मिशनरी स्कूल जाने लगे थे जहाँ उन्हें मिशनरियों के उपदेश सुनने का मौका मिला वहाँ भी उन्होंने यही सीखा की मुंडा समुदाय स्वर्ग का साम्राज्य हासिल कर सकता है और अपने खोए हुए अधिकार वापस पा सकता है यदि वे ईसाई बन जाएं और अपनी खराब आदतें छोड़ दें तो ऐसा हो सकता है। बाद में बिरसा ने एक जाने माने वैष्णव धर्म प्रचारक के साथ भी कुछ समय बिताया। उन्होंने जनेऊ धारण किया और शुद्धता और दया पर जोर देने लगे।
■ अपनी किशोरावस्था में बिरसा जिन विचारों के संपर्क में आए, उनसे वह काफी गहरे तौर पर प्रभावित थे। बिरसा का आंदोलन आदिवासी समाज को सुधारने के लिए था। उन्होंने मुंडाओं से आह्वान किया कि वे शराब पीना छोड़ दें, गांव को साफ-सुथरा रखें और डायन व जादू-टोने में विश्वास न करें। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि बिरसा ने मिशनरियों और हिन्दू जमींदारों का भी लगातार विरोध किया। वह उन्हें बाहर का मानते थे, जो मुंडा जीवन शैली को नष्ट कर रहे थे।
■ 1895 में बिरसा ने अपने अनुयायियों से आह्वान किया कि वे अपने गौरवपूर्ण अतीत को पुनर्जीवित करने के लिए संकल्प लें। वह अतीत के एक ऐसे स्वर्ण युग की चर्चा करते थे, जब मुंडा लोग अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते थे, कुदरती झरनों को नियंत्रित करते थे। पेड़ और बाग लगाते थे, पेट पालने के लिए खेती करते थे। उस काल्पनिक युग मे मुंडा अपने बिरादरों और रिश्तेदारों के खून नहीं बहाते थे। वे ईमानदारी से जीते थे। बिरसा चाहते थे कि लोग एक बार फिर अपनी जमीन पर खेती करें, एक जगह टिककर रहें और अपने खेतों में काम करें।
■ अंग्रेजों को बिरसा आंदोलन के राजनीतिक उद्देश्यों से बहुत ज्यादा परेशानी थी। जब आंदोलन फैलने लगा तो अंग्रेजों ने शख्त कार्रवाई का फैसला लिया। उन्होंने 1895 में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया और दंगे फ़साद के आरोप में दो साल की सजा सुनाई।
■ 1897 में जेल से रिहा होने के बाद बिरसा समर्थन जुटाते हुए गांव-गांव घूमने लगे। उन्होंने लोगों को उकसाने का लिए परंपरागत प्रतीकों और भाषा का इस्तेमाल किया। वे आह्वान कर रहे थे कि उनके नेतृत्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए रावणों (दीकु और यूरोपियों) को तबाह कर दें। बिरसा के अनुयायी दीकु और यूरोपीय सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाने लगे उन्होंने थाने और चर्चों पर हमले किए और महाजन व जमींदारों की संपत्तियों पर धावा बोल दिया। सफेद झंडा बिरसाराज का प्रतीक था।
■ सन 1900 में बिरसा की हैजे से मृत्यु हो गई और आंदोलन ठंडा पड़ गया। यह आंदोलन दो मायनों में महत्वपूर्ण था। पहला - इसने औपनिवेशिक सरकार को ऐसे कानून लागू करने पर मजबूर किया जिनके जरिये दीकु लोग आदिवासियों की जमीन पर आसानी से कब्जा न कर सकें। दूसरा - इसने एक बार फिर जता दिया कि अन्याय का विरोध करने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपने गुस्से को अभिव्यक्त करने में आदिवासी सक्षम हैं। उन्होंने अपने खास अंदाज में, अपनी खास रश्मों और संघर्ष के प्रतीकों के जरिए इस काम को अंजाम दिया।

Sudhanshu Mishra

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