नवाबों की छिनती सत्ता
■ अठारहवीं सदी के मध्य से ही राजाओं और सिपाहियों की ताकत छिनने लगी थी। उनकी सत्ता और सम्मान, दोनों खत्म होते जा रहे थे। बहुत सारे दरबारों में रेजिडेंट तैनात कर दिए गए थे। स्थानीय शासकों की स्वतंत्रता घटती जा रही थी। उनकी सेनाओं को भंग कर दिया गया था। उनके राजस्व वसूली के अधिकार व इलाके एक-एक करके छीने जा रहे थे।
■ बहुत सारे स्थानीय शासकों ने अपने हितों की रक्षा के लिए कंपनी के साथ बातचीत भी की। उदाहरण के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई चाहती थीं कि कंपनी उनके पति की मृत्यु के बाद उनके गोद लिए हुए बेटे को राजा मान ले। पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने भी कंपनी से आग्रह किया कि उनके पिता को जो पेंशन मिलती थी वह पिता की मृत्यु के बाद उन्हें मिलने लगे। परंतु अपनी श्रेष्ठता और सैनिक ताकत के नशे में चूर कंपनी ने इन निवेदनों को ठुकरा दिया।
■ अवध की रियासत अंग्रेजों के कब्जे में जाने वाली आखिरी रियासतों में से थी। 1801 में अवध पर एक सहायक संधि थोपी गई और 1856 में अंग्रेजों ने उसे अपने कब्जे में ले लिया। गवर्नर-जनरल डलहौजी ने ऐलान कर दिया कि रियासत के शासन को ठीक से नहीं चलाया जा रहा है इसलिए शासन को दुरुस्त करने के लिए ब्रिटिश प्रभुत्व जरूरी है।
■ कंपनी ने मुग़लों के शासन को खत्म करने की भी पूरी योजना बना ली थी। कंपनी द्वारा जारी किए गए सिक्कों से मुग़ल बादशाह का नाम हटा दिया गया। 1849 में गवर्नर जनरल डलहौजी ने ऐलान किया कि बहादुर शाह जफ़र की मृत्यु के बाद बादशाह के परिवार को लाल किले से निकाल कर कहीं और बसाया जाएगा। 1856 में गवर्नर-जनरल कैनिंग ने फैसला दिया कि बहादुर शाह जफ़र आखिरी मुग़ल बादशाह होंगे। उनकी मृत्यु के बाद उनके किसी वंशज को बादशाह नहीं माना जाएगा। उन्हें केवल राजकुमारों के रूप में मान्यता दी जाएगी।
किसान और सिपाही
■ गांव में किसान और जमींदार भारी-भरकम लगान और कर वसूली के सख्त तौर-तरीकों से परेशान थे। बहुत सारे लोग महाजनों से लिया कर्ज नहीं लौटा पा रहे थे। इसके कारण उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीनें हाथ से निकलती जा रही थीं।
■ कंपनी के तहत काम करने वाले भारतीय सिपाहियों के असंतोष की अपनी वजह थी। वे अपने वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों के कारण परेशान थे। कई नए नियम उनकी धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को ठेस पहुँचाते थे। उस जमाने में बहुत सारे लोग समुद्र पार नहीं जाना चाहते थे। उन्हें लगता था कि समुद्र यात्रा से उनका धर्म और जाति भ्रष्ट हो जाएंगे। जब 1824 में सिपाहियों को कंपनी की ओर से लड़ने के लिए समुद्र के रास्ते बर्मा जाने का आदेश मिला तो उन्होंने इस हुक्म को मानने से इनकार कर दिया। उन्हें जमीन के रास्ते से जाने में कोई ऐतराज नहीं था। सरकार का हुक्म न मानने के कारण उन्हें सख्त सजा दी गई। क्योंकि यह मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ था इसलिए 1856 में कंपनी को एक नया कानून बनाना पड़ा। इस कानून में साफ कहा गया था कि अगर कोई व्यक्ति कंपनी की सेना में नौकरी करेगा तो जरूरत पड़ने पर उसे समुद्र पार भी जाना पड़ सकता है।
■ सिपाही गांवों के हालात से भी परेशान थे। बहुत सारे सिपाही खुद किसान थे। वे अपने परिवार गांवों में छोड़कर आए थे। लिहाजा, किसानों का गुस्सा जल्दी ही सिपाहियों में फैल गया।
सुधारों पर प्रतिक्रिया
■ अंग्रेजों को लगता था कि भारतीय समाज को सुधारना जरूरी है। सती प्रथा को रोकने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने के कानून बनाए गए। अंग्रेजी भाषा की शिक्षा को जमकर प्रोत्साहन दिया गया। 1830 के बाद कंपनी ने ईसाई मिशनरियों को खुलकर काम करने और यहां तक कि जमीन व संपत्ति जुटाने की भी छूट दे दी। 1850 में एक नया कानून बनाया गया। जिससे ईसाई धर्म को अपनाना और आसान हो गया। इस कानून में प्रावधान किया गया कि अगर कोई भारतीय व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है तो भी पुरखों की संपत्ति पर उसका अधिकार पहले जैसा ही रहेगा। बहुत सारे भारतीयों को यकीन हो गया था कि अंग्रेज उनका धर्म, उनके सामाजिक रीति-रिवाज और परंपरागत जीवन शैली को नष्ट कर रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे भारतीय भी थे जो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे।
सैनिक विद्रोह जन विद्रोह बन गया
भारत के उत्तरी भागों में 1857 में ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी कि फतह और शासन के 100 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को एक भारी विद्रोह से जूझना पड़ रहा था। मई 1857 में शुरू हुई इस बगावत ने भारत में कंपनी का अस्तित्व ही खतरे में डाल दिया था। मेरठ से शुरू करके सिपाहियों ने कई जगह बगावत की। समाज के विभिन्न तबकों के असंख्य लोग विद्रोही तेवरों के साथ उठ खड़े हुए। कुछ लोग मानते हैं कि उन्नीसवीं सदी में उपनिवेशवाद के खिलाफ दुनिया भर में यह सबसे बड़ा संघर्ष था।
मेरठ से दिल्ली तक
■ 29 मार्च 1857 को युवा सिपाही मंगल पांडे को बैरकपुर में अपने अफसरों पर हमला करने के आरोप में फाँसी पर लटका दिया गया। चंद दिन बाद मेरठ में तैनात कुछ सिपाहियों ने नए कारतूसों के साथ फौजी अभ्यास करने से इनकार कर दिया। सिपाहियों को लगता था कि उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप चढ़ाया गया था। 85 सिपाहियों को नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें अपने अफसरों का हुक्म न मानने के आरोप में 10-10 साल की सजा दी गई। यह 9 मई 1857 की बात है।
■ मेरठ में तैनात दूसरे भारतीय सिपाहियों की प्रतिक्रिया बहुत जबरदस्त रही। 10 मई को सिपाहियों ने मेरठ की जेल पर धावा बोल कर वहां बंद सिपाहियों को आजाद कर लिया। उन्होंने अफसरों पर हमला करके उन्हें मार गिराया।
■ मेरठ के कुछ सिपाहियों की टोली 10 मई की रात को घोड़ों पर सवार होकर प्रातःकाल ही दिल्ली पहुंच गई। जैसे ही उनके आने की खबर फैली दिल्ली में तैनात टुकड़ियों ने भी बगावत कर दी। विजयी सिपाही लाल किले के आस-पास जमा हो गए। वे बादशाह से मिलना चाहते थे। बादशाह अंग्रेजों की भारी ताकत से दो-दो हाथ करने को तैयार नहीं थे लेकिन सिपाही भी अड़े रहे। आखिरकार वे जबरन महल में घुस गए और उन्होंने बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित कर दिया।
■ बूढ़े बादशाह को सिपाहियों की यह मांग माननी पड़ी। उन्होंने देश भर के मुखियाओं और शासकों को चिट्ठी लिखकर अंग्रेजों से लड़ने के लिए भारतीय राज्यों का एक संघ बनाने का आह्वान किया। बहादुर शाह के इस एकमात्र कदम के गहरे परिणाम सामने आए।
■ अंग्रेजों से पहले देश के एक बहुत बड़े हिस्से पर मुग़ल साम्राज्य का ही शासन था। ज्यादातर छोटे शासक और रजवाड़े मुग़ल बादशाह के नाम पर ही अपने इलाकों का शासन चलाते थे। ब्रिटिश शासन के विस्तार से भयभीत ऐसे बहुत सारे शासकों को लगता था कि अगर मुग़ल बादशाह दोबारा शासन स्थापित कर लें तो वे मुग़ल अधिपत्य में दोबारा अपने इलाकों का शासन बेफिक्र होकर चलाने लगेंगे।
■ अंग्रेजों को इन घटनाओं की उम्मीद नहीं थी। उन्हें लगता था कि कारतूसों के मुद्दे पर पैदा हुई उथल-पुथल कुछ समय में शांत हो जाएगी। लेकिन जब बहादुर शाह जफ़र ने बगावत को अपना समर्थन दे दिया तो स्थिति रातोंरात बदल गई। अक्सर ऐसा होता है कि जब लोगों को कोई रास्ता दिखाई देने लगता है तो उनका उत्साह और साहस बढ़ जाता है। इससे उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत, उम्मीद और आत्मविश्वास मिलता है।
बगावत फैलने लगी
■ जब दिल्ली से अंग्रेजों के पैर उखड़ गए तो लगभग एक हफ्ते तक कहीं कोई विद्रोह नहीं हुआ। जाहिर है खबर फैलने में भी कुछ समय तो लगना ही था। लेकिन फिर विद्रोहों का सिलसिला शुरू हो गया।
■ एक के बाद एक, हर रेजिमेंट में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और वे दिल्ली, कानपुर व लखनऊ जैसे मुख्य बिंदुओं पर दूसरी टुकड़ियों का साथ देने निकल पड़े। उनकी देखा-देखी कस्बों और गांवों के लोग भी बगावत का रास्ते पर चलने लगे। वे स्थानीय नेताओं, जमींदारों और मुखियाओं के पीछे संगठित हो गए। ये लोग अपनी सत्ता स्थापित करने और अंग्रेजो से लोहा लेने को तैयार थे। स्वर्गीय पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब कानपुर के पास ही रहते थे। उन्होंने सेना इकट्ठी की और ब्रिटिश सैनिकों को शहर से खदेड़ दिया। उन्होंने खुद को पेशवा घोषित कर दिया। उन्होंने ऐलान किया कि वह बहादुर शाह जफर के तहत गवर्नर हैं। लखनऊ की गद्दी से हटा दिए गए नवाब वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र को लखनऊ का नया नवाब घोषित कर दिया गया।
■ बिरजिस कद्र ने भी बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह मान लिया। उनकी माँ बेगम हज़रत महल ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोहों को बढ़ावा देने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। झांसी में रानी लक्ष्मीबाई भी विद्रोही सिपाहियों के साथ जा मिलीं। उन्होंने नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारी चुनौती दी। मध्य प्रदेश के मांडला क्षेत्र में, राजगढ़ की रानी अवन्ति बाई लोधी ने 4000 सैनिकों की फौज तैयार की और अंग्रेजों के खिलाफ उसका नेतृत्व किया क्योंकि ब्रिटिश शासन ने उनके राज्य के प्रशासन पर नियंत्रण कर लिया था।
■ विद्रोही टुकड़ियों के सामने अंग्रेजों की संख्या बहुत कम थी। बहुत सारे मोर्चों पर उनकी जबरदस्त हार हुई। इससे लोगों को यकीन हो गया कि अब अंग्रेजों का शासन खत्म हो चुका है। अब लोगों को विद्रोहों में कूद पड़ने का गहरा आत्मविश्वास मिल गया था। खासतौर से अवध के इलाके में चौतरफा बगावत की स्थिति थी। 6 अगस्त 1857 को लेफ्टिनेंट कर्नल टाइटलर ने अपने कमांडर-इन-चीफ को टेलीग्राम भेजा जिसमें उन्होंने अंग्रेजों के भय को व्यक्त किया था: "हमारे लोग विरोधियों की संख्या और लगातार लड़ाई से थक गए हैं। एक-एक गांव हमारे खिलाफ है। जमींदार भी हमारे खिलाफ खड़े हो रहे हैं।"
कंपनी का पलटवार
■ इस उथल-पुथल के बावजूद अंग्रेजों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। कंपनी ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर विद्रोह को कुचलने का फैसला किया। उन्होंने इंग्लैंड से और फौजी मंगवाए, विद्रोहियों को जल्दी सजा देने के लिए नए कानून बनाए और विद्रोह के मुख्य केंद्रों पर धावा बोल दिया। सितंबर 1857 में दिल्ली दोबारा अंग्रेजों के कब्जे में आ गई। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उनके बेटों को उनकी आंखों के सामने गोली मार दी गई। बहादुर शाह और उनकी पत्नी जीनत महल को अक्टूबर 1858 में रंगून जेल भेज दिया गया। इसी जेल में नवम्बर 1862 में बहादुर शाह जफ़र ने अंतिम सांस ली।
■ दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हो जाने का मतलब यह नहीं था कि विद्रोह खत्म हो चुका था। इसके बाद भी लोग अंग्रेजों से टक्कर लेते रहे। व्यापक बगावत की विशाल ताकत को कुचलने के लिए अंग्रेजों को अगले दो साल तक लड़ाई लड़नी पड़ी।
■ मार्च 1858 में लखनऊ अंग्रेजों के कब्जे में चल गया। जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई की शिकस्त हुई और उन्हें मार दिया गया। दुर्भाग्यवश, ऐसा ही रानी अवन्ति बाई लोधी के साथ हुआ। खेड़ी की शुरुआती विजय के बाद उन्होंने अपने आप को अंग्रेजी फौज से घिरा हुआ पाया और वे शहीद हो गईं।
■ तात्या टोपे मध्य भारत के जंगलों में रहते हुए आदिवासियों और किसानों की सहायता से छापामार युद्ध चलाते रहे।
■ जिस तरह अंग्रेजों के खिलाफ मिली सफलताओं से विद्रोहियों को उत्साह मिला था। उसी तरह विद्रोही ताकतों की हार से लोगों की हिम्मत टूटने लगी। बहुत सारे लोगों ने विद्रोहियों का साथ छोड़ दिया। अंग्रेजों ने भी लोगों का विश्वास जीतने का हर संभव प्रयास किया।
■ अंग्रेजों द्वारा सैकड़ों सिपाहियों, विद्रोहियों, नवाबों और राजाओं पर मुकदमें चलाए गए और उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।
विद्रोह के बाद के साल
अंग्रेजों ने 1859 के आखिर तक देश पर दोबारा नियंत्रण पा लिया था लेकिन अब वे पहले वाली नीतियों के सहारे शासन नहीं चला सकते थे। अंग्रेजों में जो अहम बदलाव किए वे निम्नलिखित हैं-
1- ब्रिटिश संसद ने 1858 में एक नया कानून पारित किया गया और ईस्ट इंडिया कंपनी के सारे अधिकार ब्रिटिश साम्राज्य के हाथ मे सौंप दिए ताकि भारतीय मामलों को ज्यादा बेहतर ढंग से संभाला जा सके। ब्रिटिश मंत्रिमंडल के एक सदस्य को भारत के मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। उसे भारत के शासन से संबंधित मामलों को संभालने का जिम्मा सौंपा गया। उसे सलाह देने के लिए एक परिषद का गठन किया गया जिसे इंडिया काउंसिल कहा जाता था। भारत के गवर्नर-जनरल को वायसराय का ओहदा दिया गया। इस प्रकार उसे इंग्लैंड के राजा या रानी का निजी प्रतिनिधि घोषित कर दिया गया। फलस्वरूप, अंग्रेज सरकार ने भारत के शासन की जिम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले ली।
2- देश के सभी शासकों को भरोसा दिया गया कि भविष्य में कभी-भी उनके भूक्षेत्र पर कब्जा नहीं किया जाएगा। उन्हें अपनी रियासत अपने वंशजों, यहां तक कि दत्तक पुत्रों को सौंपने की छूट दे दी गई। लेकिन उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे ब्रिटेन की रानी को अपना अधिपति स्वीकार करें। इस तरह, भारतीय शासकों को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन शासन चलाने की छूट दी गई।
3- सेना में भारतीय सिपाहियों के अनुपात कम करने और यूरोपीय सिपाहियों की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया गया। यह भी तय किया गया कि अवध, बिहार, मध्य भारत और दक्षिण भारत से सिपाहियों को भर्ती करने के बजाय अब गोरखा, सिक्खों और पठानों में से ज्यादा सिपाही भर्ती किए जाएंगे।
4- मुसलमानों की संपत्ति और जमीन बड़े पैमाने पर जब्त की गई। उन्हें संदेह व शत्रुता के भाव से देखा जाने लगा। अंग्रेजों को लगता था कि यह विद्रोह उन्होंने ही खड़ा किया था।
Sudhanshu Mishra
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