औपनिवेशिक शासन में शहरों की दशा
■ ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद गाँवों का जीवन बदल गया था और इसी समय शहरों में क्या हो रहा था? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह के क़स्बे या शहर की चर्चा की जा रही है। मदुरै जैसे मंदिरों के शहर का इतिहास ढाका जैसे उत्पादन शहरों या सूरत जैसे बंदरगाह या एक साथ कई तरह के काम करने वाले क़स्बों से बिल्कुल अलग मिलेगा।
■ पश्चिमी विश्व के ज्यादातर भागों में आधुनिक शहर औद्योगीकरण के साथ सामने आए थे। ब्रिटेन में लीड्स और मैनचेस्टर जैसे औद्योगिक शहर उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में तेज़ी से फैले क्योंकि बहुत सारे लोग नौकरी, मकान और अन्य सुविधाओं की उम्मीद में इन शहरों की तरफ आ रहे थे। लेकिन, उन्नीसवीं सदी में भारतीय शहर पश्चिम यूरोप के शहरों की तरह तेज़ी से नहीं फैले।
■ अठारहवीं सदी के आखिर में कलकत्ता, बम्बई और मद्रास का महत्व प्रेजिडेंसी शहरों के रूप में तेज़ी से बढ़ रहा था। ये शहर भारत में ब्रिटिश सत्ता के केंद्र बन गए थे। उसी समय बहुत सारे दूसरे शहर कमज़ोर पड़ते जा रहे थे। ख़ास चीजों के उत्पादन वाले बहुत सारे शहर इसलिए पिछड़ने लगे क्योंकि वहाँ जो चीजें बनती थीं उनकी माँग घट गई थी। जब व्यापार नए इलाकों में केंद्रित होने लगा तो पुराने व्यापारिक केंद्र और बंदरगाह पहली वाली स्थिति में नहीं रहे। इसी प्रकार, जब अंग्रेजों ने स्थानीय राजाओं को हरा दिया और शासन के नए केंद्र पैदा हुए तो क्षेत्रीय सत्ता के पुराने केंद्र भी ढह गए। इस प्रक्रिया को अक्सर विशहरीकरण कहा जाता है। मछलीपट्टनम, सूरत और श्रीरंगपट्टनम जैसे शहरों का उन्नीसवीं सदी में काफी ज्यादा विशहरीकरण हुआ। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में केवल 11 प्रतिशत लोग ही शहरों में रहते थे।
■ ऐतिहासिक शाही शहर दिल्ली उन्नीसवीं सदी में एक धूल भरा छोटा-सा कस्बा बन कर रह गया था। परंतु 1912 में ब्रिटिश भारत की राजधानी बनने के बाद इसमें दोबारा जान आ गई।
नयी दिल्ली से पहले और कितनी दिल्लियाँ थीं?
■ दिल्ली को आज हम आधुनिक भारत की राजधानी के रूप में देख रहे हैं लेकिन यह शहर एक हजार साल से भी ज्यादा समय तक राजधानी रह चुका है। इस दौरान इसमें छोटे-मोटे अंतराल भी आते रहे हैं। यमुना नदी के बाएँ किनारे पर लगभग साठ वर्ग मील के छोटे से क्षेत्रफल में कम से कम 14 राजधानियाँ अलग-अलग समय पर बसाई गईं। आधुनिक नगर राज्य दिल्ली में घूमने पर इन सारी राजधानियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इनमें बारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच बसाए गए राजधानी शहर सबसे महत्वपूर्ण थे।
■ इन सारी राजधानियों में सबसे शानदार राजधानी शाहजहाँ ने बसाई थी। शाहजहाँनाबाद की स्थापना 1639 में शुरू हुई। इसके भीतर एक किला-महल और बगल में सटा शहर था। लाल पत्थर से बने लाल किले में महल परिसर बनाया गया था। इसके पश्चिम की ओर 14 दरवाजों वाला पुराना शहर था। चाँदनी चौक के बीचोंबीच नहर थी।
■ घने मोहल्लों और दर्जनों बाज़ारों से घिरी जामा मस्जिद भारत की सबसे विशाल और भव्य मस्जिदों में से एक थी। इस समय पूरे शहर में इस मस्जिद से ऊँचा कोई स्थान नहीं था।
■ शाहजहाँ के समय दिल्ली सूफ़ी संस्कृति का भी एक अहम केंद्र हुआ करती थी। यहाँ कई दरगाह, खानकाह और ईदगाह थीं। बड़े-बड़े चौराहों, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों, खामोश कुल-दे-सेक और जल धाराओं पर दिल्ली वालों को नाज था। शायद इसीलिए मीर तकी मीर ने कहा था, "दिल्ली की सड़कें महज सड़कें नहीं हैं। वे तो किसी चित्रकार की एल्बम के पन्ने हैं।"
■ लेकिन यह भी आदर्श शहर नहीं था। इसके ऐशों-आराम भी सिर्फ कुछ लोगों के हिस्से में आते थे। अमीर और गरीब के बीच फासला बहुत गहरा था। हवेलियों के बीच गरीबों के कच्चे मकान होते थे। शायरी और नृत्य संगीत की रंग-बिरंगी दुनिया आमतौर पर सिर्फ मर्दों के मनोरंजन का साधन थीं। त्योहारों और जलसे-जुलूसों में जब-तब टकराव भी फूट पड़ते थे, सो अलग।
नयी दिल्ली का निर्माण
1803 में अंग्रेजों ने मराठों को हराकर दिल्ली पर नियंत्रण हासिल कर लिया था। क्योंकि ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी इसलिए मुग़ल बादशाह को लाल किले के महल में रहने की छूट मिली हुई थी। आज हमारे सामने जो आधुनिक शहर दिखाई देता है यह 1911 में तब बनना शुरू हुआ जब दिल्ली ब्रिटिश भारत की राजधानी बन गई।
एक अतीत का ध्वंस
■ 1857 से पहले दिल्ली के हालात दूसरे औपनिवेशिक शाहरों से काफी अलग थे। मद्रास, बम्बई या कलकत्ता में भारतीयों और अंग्रेजों की बस्तियाँ अलग-अलग होती थीं। भारतीय लोग 'काले' इलाकों में और अंग्रेज लोग सुसज्जित 'गोरे' इलाकों में रहते थे। दिल्ली में ऐसा नहीं था। खासतौर से उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली के अंग्रेज भी पुराने शहर के भीतर अमीर हिंदुस्तानियों के साथ ही रह करते थे। वे भी उर्दू/फ़ारसी संस्कृति व शायरी का मजा लेते थे और स्थानीय त्योहारों में हिस्सेदारी करते थे।
■ 1824 में दिल्ली कॉलेज की स्थापना हुई जिसकी शुरुआत अठारहवीं सदी में मदरसे के रूप में हुई थी। इस संस्था ने विज्ञान और मानवशास्त्र के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया। यहाँ मुख्य रूप से उर्दू भाषा में काम होता था। बहुत सारे लोग 1830 से 1857 की अवधि को दिल्ली पुनर्जागरण काल बताते हैं।
■ 1857 के बाद सब कुछ बदल गया। उस साल हुए विद्रोह के दौरान विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफ़र को विद्रोह का नेतृत्व सँभालने के लिए मजबूर कर दिया। चार महीने तक दिल्ली विद्रोहियों के नियंत्रण में रही।
■ जब अंग्रेजों ने शहर पर दोबारा नियंत्रण हासिल किया तो वे बदले और लूटपाट की मुहिम पर निकल पड़े। प्रसिद्ध शायर ग़ालिब उदास मन से इन घटनाओं को देख रहे थे। 1857 में दिल्ली की तबाही को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया, "जब गुस्साए शेर (अंग्रेज) शहर में दाखिल हुए तो उन्होंने बेसहारों को मारा और घर जला डाले। न जाने कितने औरत-मर्द, आम और खास, दिल्ली से भाग खड़े हुए और उन्होंने छोटे-छोटे समुदायों और शहर के बाहर मकबरों में पनाह ली।" अगली बगावतों को रोकने के लिए अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफ़र को देश से निकाल दिया। अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (म्यांमार) भेज दिया, उनका दरबार बंद कर दिया, कई महल गिरा दिए, बागों को बंद कर दिया और उनकी जगह अपने सैनिकों के लिए बैरकें बना दीं।
■ अंग्रेज दिल्ली के मुग़ल अतीत को पूरी तरह भुला देना चाहते थे। किले के इर्द-गिर्द का सारा इलाका साफ कर दिया गया। वहाँ के बाग, मैदान और मस्जिदें नष्ट कर दिए गए परंतु उन्होंने मंदिरों को नहीं तोड़ा। अंग्रेज आस-पास के इलाके को सुरक्षित करना चाहते थे। खासतौर से मस्जिदों को नष्ट कर दिया गया या उन्हें अन्य कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मिसाल के तौर पर, जीनत-अल-मस्जिद को एक बेकरी में तब्दील कर दिया गया। जामा मस्जिद में पांच साल तक किसी को नमाज की इजाजत नहीं मिली। शहर का एक-तिहाई हिस्सा ढहा दिया गया। नहरों को पाटकर समतल कर दिया गया।
■ रेलवे की स्थापना करने और शहर को चारदीवारी के बाहर फैलाने के लिए 1870 के दशक में शाहजहाँनाबाद की पश्चिमी दीवारों को तोड़ दिया गया। अब अंग्रेज उत्तर की तरफ विकसित हुए विशाल सिविल लाइंस इलाके में रहने लगे। अब वे पुराने शहर में भारतीयों के साथ नहीं रहते थे। दिल्ली कॉलेज को एक स्कूल बना दिया गया और 1877 में उसे बंद कर दिया गया।
एक नयी राजधानी की योजना
■ अंग्रेजों को दिल्ली के सांकेतिक महत्व का अच्छी तरह पता था। लिहाज़ा, 1857 की बगावत का बाद उन्होंने यहाँ बहुत सारे शानदार आयोजन किए। 1877 में वायसरॉय लिटन ने रानी विक्टोरिया को भारत की मलिका घोषित करने के लिए दरबार का आयोजन किया। वैसे तो ब्रिटिश भारत की राजधानी अभी भी कलकत्ता ही थी लेकिन इस विशाल दरबार का आयोजन दिल्ली में किया गया। विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने समझ लिया था कि लोगों की नजर में मुग़ल बादशाह का महत्व अभी भी बना हुआ है वे उसे ही अपना मुखिया मानते हैं। लिहाज़ा, ब्रिटिश सत्ता का मुग़ल बादशाहों और 1857 के बागियों के मुख्य केंद्र में पूरी तड़क-भड़क के साथ प्रदर्शन किया गया।
■ 1911 में जब जार्ज पंचम को इंग्लैंड का राजा बनाया गया तो इस मौके पर दिल्ली में एक और दरबार का आयोजन हुआ। कलकत्ता की बजाय दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने के फैसले का भी इसी दरबार में ऐलान किया गया।
■ तत्कालीन शहर के दक्षिण में रायसीना पहाड़ी पर दस वर्ग मील के इलाके में नयी दिल्ली का निर्माण किया गया। एडवर्ड लुटियंस और हर्बर्ट बेकर नाम के दो वास्तुकारों को नयी दिल्ली और उसकी इमारतों का डिज़ाइन तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया। नयी दिल्ली स्थित सरकारी परिसर में दो मील का चौड़ा रास्ता, वायसरॉय के भवन, वर्तमान राष्ट्रपति भवन, तक जाने वाला किंग्सवे, वर्तमान राजपथ, और उसके दोनों तरफ सचिवालय की इमारतें बनाई गईं। इन सरकारी इमारतों की बनावट में भारत के शाही इतिहास के अलग-अलग दौर की झलक दिखाई देती थी। फिर भी इसका रूप मोटे तौर पर पांचवीं शताब्दी पूर्व के क्लासिक यूनान का दिखाई देता था। उदाहरण के लिए, वायसरॉय पैलेस का केंद्रीय गुम्बद साँची में बने बौद्ध स्तूप कि बनावट पर आधारित था। लाल भुरभुरे पत्थर और नक्काशीदार जालियों की प्रेरणा मुग़ल वास्तुशिल्प से ली गयी थी। लेकिन नयी इमारतों में ब्रिटिश प्रभुत्व की झलक भी जरूरी थी। इसीलिए वास्तुकारों ने इस बात का खयाल रखा कि वायसरॉय का महल शाहजहाँ की जामा मस्जिद से भी ऊँचा हो।
■ नयी दिल्ली के निर्माण में लगभग 20 साल लगे। इरादा एक ऐसा शहर बनाने का था जो शाहजहाँनाबाद के मुकाबले बिल्कुल अलग हो। उसमें भीड़ भरे मोहल्लों और संकरी गलियों के लिए कोई जगह नहीं थी। नयी दिल्ली में चौड़ी, सीधी सड़कों और विशाल परिसरों के बीच बड़ी-बड़ी इमारतों की कल्पना की गई थी। पुरानी दिल्ली में अफ़रा-तफ़री दिखाई देती थी। नया शहर स्वच्छ और स्वस्थ दिखाई पड़ता था। अंग्रेजों को भीड़ भरे इलाके गंदे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बीमारियों के स्रोत दिखाई देते थे। इसीलिए नयी दिल्ली में बेहतर जलापूर्ति, गंदगी के निकास और नालियों की पूरी व्यवस्था तैयार की गई। उसे ज्यादा हरा-भरा बनाया गया। वहाँ पेड़ और बड़े-बड़े पार्क बनाए गए ताकि लगातार ताज़ी हवा और ऑक्सीजन मिलती रहे।
विभाजन के समय जीवन
■ 1947 में भारत के विभाजन से नयी सीमा के दोनों तरफ आबादी बड़ी तादाद में विस्थापित हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की आबादी बढ़ गई। रोजगार बदल गए और शहर की संस्कृति बिल्कुल भिन्न हो गई।
■ स्वतंत्रता और विभाजन के कुछ ही दिनों बाद भीषण दंगे शुरू हो गए। दिल्ली में हजारों लोग मारे गए और उनके घर-बार लूटकर जला दिए गए। दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों की जगह पाकिस्तान से आए सिख और हिन्दू शरणार्थियों ने ले ली। शाहजहाँनाबाद में लावारिस मकानों पर कब्जे के लिए शरणार्थियों के झुंड घूमने लगे। कई बार उन्होंने मुसलमानों को भाग जाने और अपनी संपत्ति बेचने के लिए मजबूर भी किया। दिल्ली के दो-तिहाई मुसलमान पलायन कर गए थे जिससे लगभग 44000 मकान खाली हो गए। बहुत सारे मुसलमान पाकिस्तान जाने के इंतजार में कामचलाऊ शिविरों में रहने लगे।
■ उस समय दिल्ली शरणार्थियों का शहर बन गई थी। दिल्ली की आबादी में लगभग पांच लाख की वृद्धि हो गयी। ज्यादातर लोग पंजाब से आए थे। वे शिविरों, स्कूलों, फौजी बैरकों और बाग-बगीचों में आकर रहने लगे। उनमें से कुछ को खाली पड़े मकानों पर कब्जे का मौका मिला गया। बहुत सारे लोग शरणार्थी बस्तियों में रहने लगे। लाजपत नगर और तिलक नगर जैसी बस्तियाँ इसी समय बसी थीं। दिल्ली में आने वालों की जरूरतों को पूरा करने के लिए दुकान और स्टॉल खुल गए। कई नए स्कूल और कॉलेज भी खोल दिए गए।
■ जो लोग यहाँ से गए थे उनकी जगह आए शरणार्थियों की निपुणता और काम-धंधे बिल्कुल अलग थे। पाकिस्तान जाने वाले बहुत सारे मुसलमान कारीगर, छोटे-मोटे व्यापारी और मज़दूर थे। दिल्ली आए नए लोग ग्रामीण भूस्वामी, वकील, शिक्षक, व्यापारी और छोटे दुकानदार थे। विभाजन ने उनकी ज़िंदगी और उनके व्यवसाय बदल दिए थे। फेरीवालों, पटरीवालों, बढ़ई और लुहारों के तौर पर उन्होंने नए रोजगार अपनाए। इनमें से बहुत सारे नए व्यवसायों में काफी सफल भी रहे।
■ पंजाब से आई विशाल टोलियों ने दिल्ली का सामाजिक परिवेश पूरी तरह बदल दिया। भोजन, पहनावे और कला के हर क्षेत्र में मुख्य रूप से उर्दू पर आधारित शहरी संस्कृति नयी रुचियों और संवेदनशीलता के नीचे दब गईं।
पुराने शहर के भीतर
■ अतीत में मुग़लों के जमाने की प्रसिद्ध नहरों से घरों में न केवल पीने का ताज़ा पानी आता था बल्कि दूसरी घरेलू जरूरतों के लिए भी पानी मिल जाता था। उन्नीसवीं सदी में जलापूर्ति और निकासी की इस बेहतरीन व्यवस्था को नजरअंदाज किया जाने लगा। कुओं की व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। घरेलू कचरे की निकासी करने वाली धाराएं भी क्षतिग्रस्त थीं। यह एक ऐसे समय की बात है जब शहर की आबादी लगातार बढ़ रही थी।
■ टूटी-फूटी नहरें इस तेज़ी से बढ़ती आबादी की जरूरत को पूरा नहीं कर सकती थीं। उन्नीसवीं सदी के आखिर में शाहजहाँनी नालियों को बंद कर दिया गया और खुली नालियों की नई व्यवस्था विकसित की गई। जल्दी ही यह प्रणाली भी बोझ से चरमराने लगी। बहुत सारे अमीर लोगों को सड़क किनारे बहती नालियों और उफनते खुले नालों की बदबू परेशान करती थी। दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी एक अच्छी निकासी व्यवस्था पर पैसा खर्च करने को तैयार नहीं थी। जबकि उसी समय नयी दिल्ली पर लाखों रुपये खर्च किए गए।
हवेलियों का पतन
■ सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में मुग़ल कुलीन वर्ग भव्य हवेलियों में रहता था। उन्नीसवीं सदी के मध्य का नक्शा देखने पर ऐसी कम से कम सौ हवेलियाँ दिखाई देती हैं। ये चारदीवारी से घिरे दालान और झरनों वाली भव्य इमारतें थीं।
■ बहुत सारे मुग़ल अमीर ब्रिटिश शासन के समय इन विशालकाय इमारतों को संभालने की हालत में नहीं थे। फलस्वरूप, हवेलियाँ बँटने लगीं। उनके हिस्सों को बेचा जाने लगा। हवेलियों के जो हिस्से सड़क पर खुलते थे वहाँ दुकाने या गोदाम बन गए। कुछ हवेलियाँ नए उभरते व्यवसायी वर्ग के नियंत्रण में चली गईं। बहुत सारी उपयोग में न होने के कारण बेकार हो गईं।
नगरपालिका की योजना
■ 1931 की जनगणना से पता चला कि पुराने शहर के इलाके में भयानक भीड़ है। यहाँ प्रति एकड़ 90 लोग रहते थे जबकि नयी दिल्ली में प्रति एकड़ केवल 3 लोगों का औसत था।
■ पुराने शहर के बिगड़ते हालात के बावजूद उसका फैलना जारी रहा। पुराने शहर के निवासियों के लिए रोबर्ट क्लार्क ने 1888 में लाहौर गेट सुधार योजना के नाम से एक विस्तार योजना तैयार की। इसके पीछे सोच यह थी कि यहाँ के निवासियों को पुराने शहर से अलग एक नए तरह के चौराहा बाजार की तरफ ढकेला जाए। इस चौराहे पर चारों तरफ दुकानों की कल्पना की गई थी। इस पुनर्विकास में सड़कों के लिए जाल वाली संरचना तय की गई। सभी सड़कों की चौड़ाई, आकार और स्वरूप एक जैसा होना था। मोहल्लों के निर्माण के लिए जमीन को एक जैसे टुकड़ों में बाँट दिया गया। यह कभी पूरा नहीं हो पाया और उसने पुराने शहर को भीड़ से आज़ाद कराने में कोई नहीं की। यहाँ तक कि 1912 में भी इन स्थानों पर जलापूर्ति और निकासी की व्यवस्था बहुत खराब थी।
■ दिल्ली सुधार ट्रस्ट के गठन 1936 में किया गया। इस योजना के तहत सम्पन्न लोगों के लिए दरियागंज दक्षिण जैसे इलाके बनाए गए। यहाँ पार्कों के इर्द-गिर्द रिहायशी मकान बने। मकानों के भीतर निजता की नयी सोच के हिसाब से जगह बँटी हुई थी। अब बहुत सारे परिवार या समूह साझा जगह पर नहीं रहते थे बल्कि मकान के भीतर एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों के लिए अलग-अलग जगह होने लगी थी।
Sudhanshu Mishra
Comments
Post a Comment